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खुरई में मंगलवार को सर्व सवर्ण समाज के बैनर तले विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों के विरोध में विशाल रैली निकाली गई। प्रदर्शनकारियों ने इन नियमों को “काला कानून” बताते हुए इन्हें तत्काल वापस लेने की मांग की। बड़ी संख्या में लोग किला मैदान में एकत्र हुए, जहां से रैली प्रारंभ होकर शहर के प्रमुख मार्गों से होती हुई तहसील कार्यालय पहुंची।
रैली में शामिल लोगों ने हाथों में काली पट्टियां बांधकर, तख्तियां लेकर और नारेबाजी करते हुए विरोध दर्ज कराया। रैली किला मैदान से शुरू होकर शिवाजी चौक, झंडा चौक, परसा चौराहा और राजीव गांधी चौक से गुजरते हुए तहसील कार्यालय पहुंची, जहां राष्ट्रपति के नाम नायब तहसीलदार सुरेश सोनी को ज्ञापन सौंपा गया।
सामान्य वर्ग पर बढ़ेगा मानसिक दबाव

तहसील कार्यालय परिसर में आयोजित सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि यूजीसी के नए नियमों से सामान्य/अनारक्षित वर्ग के विद्यार्थियों और शिक्षकों पर अतिरिक्त मानसिक दबाव पड़ेगा। इससे कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसरों में भय और असंतुलन का वातावरण बनेगा, जो छात्रों की पढ़ाई और भविष्य को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा।
वक्ताओं का कहना था कि यूजीसी एक्ट 2026 में समानता की बात तो की गई है, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), अनुच्छेद 15 (भेदभाव निषेध) और अनुच्छेद 21 (गरिमामय जीवन का अधिकार) के अनुरूप अनारक्षित वर्ग के अधिकारों, सुरक्षा और आत्मसम्मान को लेकर कोई स्पष्ट और संतुलित प्रावधान नहीं किए गए हैं।
‘संभावित अपराधी’ की मानसिकता थोपने का आरोप
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि संशोधित यूजीसी नियमों की संरचना से ऐसा प्रतीत होता है कि अनारक्षित/सवर्ण वर्ग को संस्थागत रूप से “संभावित अपराधी” और आरक्षित वर्ग को “स्वाभाविक पीड़ित” मानकर नियम बनाए गए हैं, जो लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है।

ज्ञापन में उल्लेख किया गया कि इन दिशानिर्देशों में एकतरफा और पूर्वाग्रही दृष्टिकोण अपनाया गया है तथा संतुलन का अभाव है। इससे सवर्ण समाज को सामूहिक रूप से संदेह के दायरे में खड़ा किया जा रहा है।
दुरुपयोग और भय का माहौल बनने की आशंका
वक्ताओं ने आशंका जताई कि किसी भी अकादमिक मतभेद, परीक्षा मूल्यांकन, अनुशासनात्मक कार्रवाई या व्यक्तिगत विवाद को जातीय उत्पीड़न का रूप देकर शिकायत में बदला जा सकता है। इससे सवर्ण छात्रों में स्थायी भय और मानसिक दबाव की स्थिति बनेगी कि कहीं वे झूठे या दुर्भावनापूर्ण आरोपों में न फंसा दिए जाएं।
उन्होंने कहा कि यदि शिकायत प्रक्रिया में कठोर जांच, क्रॉस-वेरिफिकेशन और दुरुपयोग रोकने के स्पष्ट प्रावधान नहीं होंगे, तो छात्र राजनीति, नियुक्तियों और प्रशासनिक निर्णयों में “कास्ट कार्ड” के दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाएगी।
प्राकृतिक न्याय की अनदेखी का आरोप

प्रदर्शनकारियों ने यह भी कहा कि नए नियमों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों—जैसे निर्दोष माने जाने की धारणा, निष्पक्ष सुनवाई और संतुलित जांच—का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इससे शिक्षा परिसरों में अविश्वास और वर्गीय ध्रुवीकरण बढ़ सकता है, जो शिक्षा के मूल उद्देश्य के प्रतिकूल है।
नियम वापस लेने की मांग
ज्ञापन के माध्यम से सर्व सवर्ण समाज ने मांग की है कि यूजीसी के नए नियमों की पुनः समीक्षा की जाए, सभी वर्गों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए संतुलित और निष्पक्ष प्रावधान जोड़े जाएं तथा वर्तमान स्वरूप में इन नियमों को वापस लिया जाए।
प्रशासन की ओर से ज्ञापन प्राप्त कर उचित माध्यम से संबंधित स्तर पर भेजने का आश्वासन दिया गया है