दतिया। मध्य प्रदेश के दतिया जिला अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोलने वाला एक मामला सामने आया है। जहां सरकार गर्भवती महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और त्वरित उपचार उपलब्ध कराने के दावे कर रही है, वहीं जिला अस्पताल में नौ माह की गर्भवती महिला को इलाज के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा। इतना ही नहीं, अस्पताल में स्ट्रेचर तक उपलब्ध नहीं कराया गया, जिसके कारण पति को अपनी गर्भवती पत्नी का सहारा बनकर अस्पताल के विभिन्न वार्डों तक पैदल ले जाना पड़ा।
घटना सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो ने भी स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति उजागर कर दी है।
जानकारी के अनुसार, दतिया जिले के बहादुरपुर गांव निवासी 20 वर्षीय मनीषा अहिरवार अपने गर्भावस्था के नौवें महीने में हैं। शनिवार सुबह प्रसव संबंधी जांच और उपचार के लिए उनके पति मनोज अहिरवार और परिवार के अन्य सदस्य उन्हें जिला अस्पताल लेकर पहुंचे थे। परिजनों का कहना है कि सुबह करीब साढ़े नौ बजे अस्पताल पहुंचने के बावजूद महिला का इलाज शाम करीब पांच बजे शुरू हो पाया।
परिवार का आरोप है कि अस्पताल पहुंचने के बाद उन्हें पहले ओपीडी में भेजा गया, फिर अलग-अलग जांच और वार्डों के चक्कर लगवाए गए। इस दौरान किसी भी कर्मचारी या डॉक्टर ने महिला की स्थिति को गंभीरता से नहीं लिया। गर्भावस्था के अंतिम चरण में होने के कारण महिला को चलने-फिरने में काफी कठिनाई हो रही थी, लेकिन अस्पताल प्रशासन की ओर से कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गई।
सबसे चिंताजनक बात यह रही कि अस्पताल में गर्भवती महिला के लिए स्ट्रेचर तक उपलब्ध नहीं कराया गया। परिजनों ने कई बार अस्पताल स्टाफ से स्ट्रेचर की मांग की, लेकिन उन्हें कोई सहायता नहीं मिली। मजबूरी में पति मनोज अहिरवार अपनी पत्नी को सहारा देकर एक विभाग से दूसरे विभाग तक ले जाते रहे।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, महिला को कई बार बैठकर आराम करना पड़ा क्योंकि वह लगातार दर्द और कमजोरी महसूस कर रही थी। इसके बावजूद उसे समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई। अस्पताल परिसर में मौजूद लोगों ने भी इस स्थिति को देखकर आश्चर्य व्यक्त किया और कहा कि यदि गर्भवती महिलाओं को भी ऐसी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है तो आम मरीजों की स्थिति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
पीड़ित महिला के पति मनोज अहिरवार ने बताया कि वे सुबह उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचे थे कि उनकी पत्नी को तत्काल जांच और उपचार मिलेगा, लेकिन वहां उन्हें केवल इंतजार ही करना पड़ा। उन्होंने कहा कि कई घंटों तक अस्पताल के कर्मचारी उनकी बात सुनने को तैयार नहीं थे। पत्नी की हालत देखकर वे बार-बार मदद मांगते रहे, लेकिन कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
मनोज के अनुसार, अस्पताल में मौजूद अधिकांश कर्मचारी उन्हें अलग-अलग जगह भेजते रहे। कभी किसी डॉक्टर के पास जाने को कहा गया तो कभी किसी अन्य वार्ड में। इस प्रक्रिया में उनकी पत्नी को लगातार चलना पड़ा, जिससे उसकी परेशानी और बढ़ गई। आखिरकार कई घंटे बाद उपचार शुरू किया गया।
रविवार सुबह इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। वीडियो में गर्भवती महिला को पति के सहारे चलते हुए देखा जा सकता है। वीडियो सामने आने के बाद लोगों में अस्पताल प्रशासन के प्रति नाराजगी देखी जा रही है। सोशल मीडिया पर भी लोग स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जिला अस्पताल में आए दिन मरीजों को अव्यवस्था का सामना करना पड़ता है। कभी डॉक्टरों की कमी तो कभी संसाधनों के अभाव की शिकायतें सामने आती रहती हैं। लेकिन गर्भवती महिलाओं जैसे संवेदनशील मामलों में भी यदि ऐसी लापरवाही बरती जा रही है तो यह बेहद चिंताजनक है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भावस्था के अंतिम चरण में महिलाओं को विशेष देखभाल और प्राथमिकता के आधार पर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। प्रसव पूर्व जांच और उपचार में देरी मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। ऐसे मामलों में अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
इस घटना ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया है। सरकार द्वारा मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनकी प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
फिलहाल घटना को लेकर अस्पताल प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि वीडियो वायरल होने और मामले के चर्चा में आने के बाद स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से जवाब मांगा जा रहा है। उम्मीद की जा रही है कि मामले की जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी ताकि भविष्य में किसी अन्य गर्भवती महिला को इस तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।
यह घटना केवल एक महिला की परेशानी की कहानी नहीं है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की उन कमियों को उजागर करती है, जिनका खामियाजा आम मरीजों को भुगतना पड़ता है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेकर सुधारात्मक कदम उठाता है।