छतरपुर के श्यामा प्रसाद मुखर्जी अंतरराज्यीय बस स्टैंड पर शनिवार दोपहर एक बेहद संवेदनहीन और झकझोर देने वाला दृश्य देखने को मिला। यहां एक अज्ञात व्यक्ति का शव करीब दो घंटे तक खुले में पड़ा रहा, लेकिन इस दौरान न तो एम्बुलेंस मौके पर पहुंची और न ही शव वाहन की कोई व्यवस्था हो सकी। हैरानी की बात यह रही कि इतने लंबे समय तक शव पड़े रहने के बावजूद बस स्टैंड पर यात्रियों की आवाजाही सामान्य बनी रही।

बस स्टैंड परिसर में ही रहता था मृतक
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मृतक की उम्र करीब 45 से 50 वर्ष के बीच थी। वह लंबे समय से बस स्टैंड परिसर के आसपास ही रहता था। भीख मांगकर जीवन यापन करता था और रात में भी वहीं सो जाया करता था। उसके पास ढंग के कपड़े तक नहीं थे। स्थानीय लोगों ने आशंका जताई है कि कड़ाके की ठंड के कारण उसकी तबीयत बिगड़ी और उसकी मौत हो गई।
अचानक बिगड़ी तबीयत, जमीन पर गिर पड़ा
बताया गया कि शनिवार दोपहर वह रोज की तरह बस स्टैंड परिसर में धूप लेने बैठा था। इसी दौरान अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई और वह वहीं जमीन पर गिर पड़ा। आसपास मौजूद लोगों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। पुलिस मौके पर पहुंची, लेकिन शव को अस्पताल ले जाने के लिए कोई वाहन उपलब्ध नहीं हो सका।

शव वाहन के लिए घंटों इंतजार
पुलिसकर्मियों ने नगर पालिका अधिकारियों से शव वाहन की मांग की, लेकिन काफी देर तक इंतजार के बावजूद कोई मदद नहीं मिली। इस दौरान शव खुले में पड़ा रहा। मौके पर मौजूद लोगों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए और नाराजगी जाहिर की।
आवारा कुत्तों से बचाने दुकानदारों ने ढका शव
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बस स्टैंड के दुकानदारों ने मानवीय पहल करते हुए अपने खर्च पर सफेद चादर खरीदी और शव को ढका, ताकि यात्रियों और आसपास के लोगों को परेशानी न हो। इस दौरान आवारा कुत्ते भी शव के आसपास मंडराते रहे, जिससे हालात और भी शर्मनाक हो गए।

ई-रिक्शा चालक ने निभाई इंसानियत
सरकारी मदद का काफी देर तक इंतजार करने के बाद आखिरकार एक ई-रिक्शा चालक ने इंसानियत की मिसाल पेश की। उसने बिना किसी शुल्क के अपने ई-रिक्शा से शव को जिला अस्पताल पहुंचाया। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने मृतक को मृत घोषित कर दिया और शव को मॉर्चुरी में रखवा दिया गया।
पहचान के प्रयास जारी
फिलहाल मृतक की पहचान नहीं हो सकी है। पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है और उसकी पहचान कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। यह घटना न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि समाज और सिस्टम के सामने भी गंभीर सवाल खड़े करती है कि एक बेसहारा इंसान की मौत के बाद भी समय पर मदद क्यों नहीं पहुंच पाई।