‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ पर सवाल: 3556 करोड़ खर्च के बाद भी सूखे जलस्रोत !

Spread the love

सागर \भोपाल: मध्य प्रदेश सरकार द्वारा शुरू किया गया ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार वजह उपलब्धि नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत है। 19 मार्च से अभियान के नए चरण की शुरुआत हुई है, पर पिछले दो वर्षों में खर्च हुए 3556 करोड़ रुपए के बावजूद जल संरक्षण की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। कई जिलों में जलस्रोत सूखे पड़े हैं और जिन ‘अमृत सरोवरों’ को मॉडल प्रोजेक्ट बताया गया था, वहां खेती हो रही है।


करोड़ों खर्च, लेकिन नतीजे अधूरे

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024 और 2025 में मिलाकर 1.25 लाख से अधिक जलस्रोतों को साफ करने, पुनर्जीवित करने और अतिक्रमण मुक्त करने के लिए 3556 करोड़ रुपए खर्च किए गए।

  • 2024 में: 1056 करोड़ रुपए खर्च, 38 हजार से ज्यादा कार्य
  • 2025 में: 2500 करोड़ रुपए खर्च, 86 हजार खेत-तालाब और 553 अमृत सरोवर का लक्ष्य

इसके बावजूद, कई जगहों पर इन कार्यों का प्रभाव जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा।


अमृत सरोवर बने ‘कागजी मॉडल’

अभियान के तहत बनाए गए ‘अमृत सरोवर’ जल संरक्षण के प्रतीक माने गए थे, लेकिन कई स्थानों पर यह योजना सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है।

  • दमोह जिले के पिपरिया किरऊ गांव में अमृत सरोवर के नाम पर सिर्फ एक शिलालेख मौजूद है, जबकि जमीन पर फसल लहलहा रही है।
  • स्थानीय लोगों के अनुसार, करीब 14 एकड़ जमीन पर एक ही परिवार खेती कर रहा है।
  • प्रशासन ने कार्रवाई के नाम पर केवल जुर्माना लगाया, लेकिन अतिक्रमण नहीं हटाया गया।

सागर में सिर्फ दिखावा, पानी की गुणवत्ता जस की तस

सागर जिले में नदी सफाई के नाम पर केवल घाटों की रंगाई-पुताई की गई।

  • नालों का गंदा पानी आज भी नदियों में मिल रहा है
  • पानी में शैवाल और गंदगी बनी हुई है
  • वास्तविक जल गुणवत्ता सुधार के लिए कोई ठोस कदम नजर नहीं आता

रायसेन में तालाब पर अतिक्रमण

रायसेन जिले के एक 95 एकड़ के तालाब में से करीब 60 एकड़ भूमि पर अतिक्रमण हो चुका है।

  • शेष क्षेत्र जलकुंभी और गंदगी से भर गया है
  • सफाई अभियान अधूरा छोड़ दिया गया
  • तालाब अपनी मूल पहचान खोता जा रहा है

देवरी का ऐतिहासिक तालाब संकट में

400 साल पुराना देवरी का बड़ा तालाब भी इस अभियान के बावजूद उपेक्षा का शिकार है।

  • 75% क्षेत्र जलकुंभी और गंदगी से ढका
  • अतिक्रमण हटाने और सफाई का काम अधूरा

खेत-तालाब योजना भी बेअसर

खेत-तालाब योजना के तहत बनाए गए ढांचे भी किसानों के लिए उपयोगी साबित नहीं हो पा रहे।

  • साल के 8 महीने तक ये तालाब सूखे रहते हैं
  • सिंचाई के लिए कोई स्थायी समाधान नहीं मिल पा रहा

जागरूकता पर खर्च, जमीनी असर कम

कई जिलों में इस अभियान के तहत जागरूकता कार्यक्रमों पर भारी खर्च किया गया, लेकिन वास्तविक जल संरक्षण के प्रयास कमजोर नजर आए।

  • पोस्टर, बैनर और कार्यक्रमों पर जोर
  • लेकिन जलस्रोतों की स्थिति में सुधार नहीं

फिर नया बजट, पुराने सवाल बरकरार

अब सरकार ने इस वर्ष के लिए 195 करोड़ रुपए का नया बजट तैयार किया है।

  • पंचायत विभाग: 170 करोड़ रुपए
  • वन्यजीव जल स्रोत: 25 करोड़ रुपए
  • कुल 2700 से अधिक कार्य प्रस्तावित

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह नया बजट भी पुराने अधूरे कार्यों में ही खर्च होगा, या वास्तव में जल संकट का समाधान करेगा?


मुख्य सवाल जो उठ रहे हैं

  • क्या करोड़ों रुपए का उपयोग सही दिशा में हुआ?
  • अमृत सरोवरों पर अतिक्रमण क्यों नहीं हटाया गया?
  • जल गुणवत्ता सुधार पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया?
  • क्या निगरानी तंत्र कमजोर है या भ्रष्टाचार हावी है?

‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ का उद्देश्य प्रदेश में जल संकट को कम करना और जलस्रोतों को पुनर्जीवित करना था। लेकिन जमीनी हकीकत बताती है कि योजना का क्रियान्वयन कई जगहों पर कमजोर रहा है।
यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद प्रदेश की “प्यासी धरती” की प्यास बुझाना मुश्किल हो जाएगा।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *