सागर। बीना विकासखंड के ग्राम गुलौआ के प्रगतिशील किसान हीरालाल कुशवाहा ने पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को अपनाकर खेती को लाभकारी व्यवसाय में बदल दिया है। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने जैविक सब्जी उत्पादन, दुग्ध उत्पादन और खेती में नवाचार के माध्यम से यह साबित कर दिया कि यदि किसान वैज्ञानिक सोच और मेहनत के साथ कार्य करे तो खेती घाटे का नहीं बल्कि मुनाफे का सौदा बन सकती है।
ग्राम गुलौआ के किसान हीरालाल कुशवाहा पिछले दो वर्षों से लगभग एक एकड़ भूमि में जैविक एवं प्राकृतिक तरीके से सब्जियों की खेती कर रहे हैं। उनके खेतों में बैंगन, भिंडी, टमाटर, ककड़ी, करेला सहित कई प्रकार की सब्जियां उगाई जा रही हैं। उन्होंने बताया कि शुरुआत में प्राकृतिक खेती अपनाने के दौरान उत्पादन अपेक्षाकृत कम मिला और कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन धैर्य और निरंतर प्रयासों के चलते धीरे-धीरे खेती की यह पद्धति सफल होती चली गई। वर्तमान में वे प्रतिदिन लगभग 40 किलो जैविक सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं।
हीरालाल कुशवाहा द्वारा उत्पादित जैविक सब्जियां आसपास के क्षेत्रों में विशेष रूप से पसंद की जा रही हैं। जागरूक उपभोक्ता रसायन मुक्त और स्वास्थ्यवर्धक सब्जियों की मांग कर रहे हैं, जिसके कारण उनकी उपज को अच्छा बाजार भी मिल रहा है। किसान हीरालाल बताते हैं कि लोग अब स्वास्थ्य को लेकर अधिक जागरूक हो रहे हैं और रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों से मुक्त सब्जियों को प्राथमिकता दे रहे हैं। यही कारण है कि उनकी सब्जियों की मांग लगातार बढ़ रही है।

वे अपनी उपज को स्थानीय बाजारों के साथ-साथ कृषि विभाग द्वारा बीना में आयोजित जैविक हाट बाजार में भी विक्रय के लिए भेजते हैं। प्रत्येक रविवार को आयोजित होने वाले इस हाट बाजार में जैविक उत्पादों की अच्छी मांग रहती है, जिससे उन्हें बेहतर मूल्य प्राप्त हो रहा है। इससे न केवल उनकी आय में वृद्धि हुई है, बल्कि जैविक खेती के प्रति अन्य किसानों की रुचि भी बढ़ी है।
हीरालाल कुशवाहा केवल सब्जी उत्पादन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्होंने खेती के साथ पशुपालन को भी जोड़ा है। उनके पास वर्तमान में पांच पशु हैं, जिनके गोबर का उपयोग वे जैविक खाद तैयार करने में करते हैं। गोबर से निर्मित खाद और प्राकृतिक घोलों के उपयोग से उनकी खेती की लागत में काफी कमी आई है। साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरता में भी सुधार हुआ है। उनका मानना है कि प्राकृतिक खेती केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि मिट्टी और पर्यावरण को बचाने का एक प्रभावी तरीका भी है।
उन्होंने बताया कि पहले रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर काफी खर्च होता था, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती थी। लेकिन अब जैविक खाद के उपयोग से खर्च कम हुआ है और उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर हुई है। इससे उपभोक्ताओं का विश्वास भी बढ़ा है और बाजार में उनकी अलग पहचान बनी है।
कृषि विभाग द्वारा भी उन्हें लगातार तकनीकी मार्गदर्शन और सहयोग प्रदान किया जा रहा है। कृषि विभाग की ओर से उनके खेत की मिट्टी की जांच कर सॉइल हेल्थ कार्ड उपलब्ध कराया गया। जांच में मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों एवं कमियों की जानकारी दी गई, ताकि वे आवश्यक सुधार कर भूमि की उर्वरता और उत्पादन क्षमता को और बेहतर बना सकें। सॉइल हेल्थ कार्ड के माध्यम से उन्हें यह समझने में मदद मिली कि खेत में किस प्रकार के पोषक तत्वों की आवश्यकता है और किस मात्रा में उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए।

हीरालाल कुशवाहा ने बताया कि वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी अवधेश राय द्वारा उन्हें लगातार प्रोत्साहित किया गया और समय-समय पर तकनीकी सलाह दी गई। कृषि विभाग द्वारा मसूर एवं गेहूं के बीज अनुदान पर उपलब्ध कराए गए, जिससे उन्हें अतिरिक्त लाभ मिला। विभागीय सहयोग के कारण वे नई तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित हुए और खेती में बेहतर परिणाम प्राप्त कर सके।
हीरालाल कुशवाहा की सफलता अब आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बन रही है। कई किसान उनके खेत का भ्रमण कर प्राकृतिक खेती की तकनीकों को समझ रहे हैं और स्वयं भी जैविक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि किसान कम लागत में अधिक लाभ कमाना चाहते हैं, तो उन्हें प्राकृतिक खेती, पशुपालन और विविधीकृत कृषि पद्धति को अपनाना चाहिए।
कृषि विशेषज्ञों का भी मानना है कि भविष्य में जैविक खेती की मांग और अधिक बढ़ेगी। ऐसे में हीरालाल कुशवाहा जैसे किसान न केवल स्वयं आर्थिक रूप से मजबूत बन रहे हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्वस्थ समाज निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उनकी यह पहल ग्रामीण क्षेत्रों में आत्मनिर्भर और टिकाऊ खेती का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरी है।