बीना विकासखंड के ग्राम गुलाबवा में दो प्रगतिशील किसानों बाबलू कुशवाहा और लीलाधर कुशवाहा ने खेती की पारंपरिक पद्धति को छोड़कर जैविक और प्राकृतिक खेती को अपनाकर एक नई मिसाल कायम की है। उनकी यह पहल न केवल कृषि लागत में कमी ला रही है, बल्कि उनकी आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि कर रही है।
जैविक खेती की ओर सफल बदलाव
किसान बाबलू कुशवाहा और लीलाधर कुशवाहा बताते हैं कि उन्होंने पूरी तरह से रासायनिक खेती छोड़कर जैविक और प्राकृतिक खेती को अपनाया है। आज उनके खेतों में टमाटर, बैंगन, ककड़ी, गिलकी और भिंडी जैसी सब्जियों के साथ-साथ संतरा, अंगूर और कटहल जैसे फल भी सफलतापूर्वक उगाए जा रहे हैं।
वे अपनी खेती में केवल प्राकृतिक संसाधनों जैसे गोबर, गोमूत्र, बायोगैस स्लरी, जीवामृत और अन्य जैविक खादों का उपयोग करते हैं, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता भी लगातार बेहतर हो रही है।

आत्मनिर्भर खेती का मॉडल
दोनों किसानों के पास लगभग 10–12 पशु हैं, जिनसे प्राप्त गोबर और गोमूत्र का उपयोग कर वे अपनी खेती को पूरी तरह आत्मनिर्भर बना रहे हैं। इससे बाहरी संसाधनों पर निर्भरता कम हुई है और उत्पादन लागत में भी भारी कमी आई है।
सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर बढ़ी क्षमता
किसानों ने कृषि विभाग की बायोगैस योजना और सौर ऊर्जा योजना का लाभ लेकर अपनी खेती को और अधिक आधुनिक और टिकाऊ बनाया है। इसके साथ ही उन्होंने शासन की विभिन्न किसान हितैषी योजनाओं के तहत कृषि यंत्रों पर अनुदान भी प्राप्त किया है, जिससे खेती में तकनीकी सुधार संभव हुआ है।

पराली न जलाने की अनोखी पहल
बाबलू कुशवाहा की सबसे प्रेरणादायक पहल यह है कि उन्होंने अपने खेतों में कभी भी पराली नहीं जलाई। इस वर्ष गेहूं की 1544 किस्म की फसल की कटाई के बाद उन्होंने पराली को जलाने के बजाय रोटावेटर से खेत में मिला दिया, जिससे वह प्राकृतिक खाद में परिवर्तित हो गई।
इसके बाद उसी भूमि में उन्होंने मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलों की बुवाई की, जिससे मिट्टी की उर्वरता और अधिक बढ़ी। यह मॉडल पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि का उत्कृष्ट उदाहरण बन गया है।
कृषि विभाग का सहयोग और निरीक्षण
हाल ही में वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी श्री अवधेश राय द्वारा दोनों किसानों के खेतों का निरीक्षण किया गया। इस दौरान उन्होंने कृषि विभाग द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं और उनके क्रियान्वयन की समीक्षा की।
अधिकारियों ने पाया कि किसान न केवल योजनाओं का लाभ ले रहे हैं, बल्कि उन्हें प्रभावी रूप से अपने कृषि मॉडल में लागू भी कर रहे हैं।
किसानों की पहल बनी प्रेरणा
कृषि अधिकारियों ने इन किसानों की सराहना करते हुए कहा कि बाबलू और लीलाधर कुशवाहा जैसे प्रगतिशील किसान अन्य किसानों के लिए प्रेरणा हैं। उनकी जैविक खेती की पद्धति पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी लाभकारी साबित हो रही है।

जैविक खेती का बढ़ता महत्व
आज के समय में जब रासायनिक खेती से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो रही है, ऐसे में जैविक खेती एक बेहतर विकल्प के रूप में उभर रही है। इस प्रकार की खेती न केवल स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित है, बल्कि लंबे समय तक कृषि भूमि की उत्पादकता बनाए रखने में भी सहायक है।
बीना विकासखंड के इन प्रगतिशील किसानों की पहल यह साबित करती है कि यदि सही दिशा और तकनीक अपनाई जाए तो खेती को लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सकता है। जैविक खेती, सरकारी योजनाओं का सही उपयोग और पर्यावरण के प्रति जागरूकता मिलकर एक ऐसे कृषि मॉडल का निर्माण कर रहे हैं, जो आने वाले समय में पूरे क्षेत्र के लिए उदाहरण बन सकता है।