टाटा ट्रस्ट्स की अहम बोर्ड मीटिंग फिर टली: टाटा संस की लिस्टिंग और गवर्नेंस विवाद बना वजह !

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टाटा ट्रस्ट्स की 8 मई को प्रस्तावित महत्वपूर्ण बोर्ड बैठक अब 16 मई को आयोजित की जाएगी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रस्ट के भीतर चल रहे मतभेदों और रणनीतिक मुद्दों पर सहमति नहीं बनने के कारण बैठक को दूसरी बार टालना पड़ा है। इससे टाटा समूह के भविष्य, गवर्नेंस मॉडल और टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक यह बैठक पहले 12 मई को प्रस्तावित थी, लेकिन बाद में इसकी तारीख बदलकर 8 मई की गई। अब इसे फिर आगे बढ़ाकर 16 मई कर दिया गया है। लगातार तारीखों में बदलाव से यह संकेत मिल रहा है कि ट्रस्ट के भीतर कई अहम मुद्दों पर अभी सहमति नहीं बन पाई है।

टाटा संस बोर्ड में प्रतिनिधित्व पर चर्चा

बैठक का सबसे बड़ा एजेंडा Tata Sons के बोर्ड में टाटा ट्रस्ट्स के प्रतिनिधित्व को लेकर था। चर्चा इस बात पर होनी थी कि टाटा ट्रस्ट्स की ओर से बोर्ड में कौन नॉमिनी डायरेक्टर रहेगा। रिपोर्ट्स के अनुसार, उद्योगपति Venu Srinivasan की जगह पूर्व टाइटन प्रमुख Bhaskar Bhat को नॉमिनी डायरेक्टर बनाए जाने पर विचार किया जाना था।

नॉमिनी डायरेक्टर वह प्रतिनिधि होता है, जिसे बड़ी हिस्सेदारी रखने वाली संस्था अपने हितों की रक्षा के लिए कंपनी के बोर्ड में नियुक्त करती है। चूंकि टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, इसलिए बोर्ड में उसका प्रभाव बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

टाटा संस की लिस्टिंग बना सबसे बड़ा मुद्दा

बैठक में सबसे ज्यादा चर्चा टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को लेकर होने वाली थी। समूह के भीतर इस बात को लेकर मतभेद हैं कि कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध किया जाए या इसे निजी कंपनी ही बनाए रखा जाए।

टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन Noel Tata कथित तौर पर टाटा संस को निजी कंपनी बनाए रखने के पक्ष में हैं। वहीं कुछ ट्रस्टी और वरिष्ठ सदस्य मानते हैं कि लिस्टिंग से कंपनी में पारदर्शिता बढ़ेगी और कॉरपोरेट गवर्नेंस मजबूत होगी।

यह विवाद इसलिए भी अहम हो गया है क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक के नए नियमों के तहत बड़ी एनबीएफसी कंपनियों को शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना अनिवार्य हो सकता है।

RBI के नियमों से बढ़ा दबाव

रिपोर्ट्स के अनुसार, 1 जुलाई 2026 से टाटा संस को “सिस्टमैटिकली इम्पोर्टेंट” एनबीएफसी की श्रेणी में रखा जा सकता है। आरबीआई के नियमों के मुताबिक जिन एनबीएफसी कंपनियों की एसेट साइज 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक होती है, उन्हें शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना पड़ सकता है।

टाटा समूह इससे पहले भी लिस्टिंग से बचने की कोशिश कर चुका है। वर्ष 2022 में समूह ने अपने वित्तीय ढांचे में बदलाव कर खुद को अलग श्रेणी में रखने का प्रयास किया था। लेकिन अब नियामकीय दबाव पहले से ज्यादा बढ़ गया है।

नोएल टाटा और चंद्रशेखरन के बीच मतभेद

बैठक में Natarajan Chandrasekaran और नोएल टाटा के बीच उभरे मतभेदों पर भी चर्चा होनी थी। सूत्रों के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच गवर्नेंस और रणनीतिक फैसलों को लेकर अलग-अलग सोच सामने आई है।

रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि नोएल टाटा ने टाटा संस के भविष्य और लिस्टिंग को लेकर स्पष्ट आश्वासन मांगा था, लेकिन चंद्रशेखरन ने इसे नियामकीय मामला बताते हुए कोई गारंटी देने से इनकार कर दिया। इसी कारण उनके तीसरे कार्यकाल के अनुमोदन को लेकर भी चर्चा प्रभावित हुई।

गवर्नेंस मॉडल पर उठे सवाल

टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में बड़ी हिस्सेदारी होने के कारण समूह की गवर्नेंस संरचना हमेशा से महत्वपूर्ण रही है। अब सवाल यह उठ रहा है कि आने वाले समय में टाटा समूह का नियंत्रण और मालिकाना ढांचा किस दिशा में जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि टाटा संस शेयर बाजार में सूचीबद्ध होती है, तो इससे समूह की पारदर्शिता बढ़ सकती है, लेकिन साथ ही टाटा ट्रस्ट्स का नियंत्रण अपेक्षाकृत कम हो सकता है। यही कारण है कि इस मुद्दे पर ट्रस्ट के भीतर अलग-अलग राय दिखाई दे रही है।

निवेशकों और बाजार की नजरें बैठक पर

कॉरपोरेट जगत और निवेशकों की नजरें अब 16 मई को होने वाली बैठक पर टिकी हैं। माना जा रहा है कि इस बैठक में लिए गए फैसले टाटा समूह की भविष्य की रणनीति, नियंत्रण व्यवस्था और बाजार में उसकी दिशा तय कर सकते हैं।

टाटा समूह देश के सबसे बड़े और विश्वसनीय कारोबारी समूहों में गिना जाता है। ऐसे में टाटा संस की संभावित लिस्टिंग और ट्रस्ट के भीतर चल रही चर्चाएं भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर में बड़ी हलचल पैदा कर रही हैं।

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