यह मामला अप्रैल 2026 में सीहोर जिले के भेरूंदा और सतदेव क्षेत्र में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम से जुड़ा है, जहां बड़ी मात्रा में दूध नर्मदा नदी में अर्पित किया गया था और साड़ियों का विसर्जन भी किया गया था। मामले को लेकर पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों ने चिंता जताई थी, जिसके बाद एनजीटी में याचिका दायर की गई।
धार्मिक आयोजन बना पर्यावरणीय बहस का विषय
मामले की सुनवाई नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की भोपाल सेंट्रल जोन बेंच में जस्टिस श्योकुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने की।

याचिका में कहा गया कि सीहोर जिले की नसरुल्लागंज तहसील के ग्राम सतदेव और भेरूंदा क्षेत्र में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम के दौरान लगभग 11 हजार लीटर दूध और 210 साड़ियों का नर्मदा नदी में विसर्जन किया गया। याचिकाकर्ता ने इसे पर्यावरण और नदी की पारिस्थितिकी के लिए नुकसानदायक बताया।
याचिका में कहा गया कि इस तरह की गतिविधियों से जल प्रदूषण बढ़ सकता है, जलीय जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और नदी का पानी सिंचाई एवं पेयजल के लिए भी प्रभावित हो सकता है।
NGT ने मांगा वैज्ञानिक अध्ययन
सुनवाई के दौरान एनजीटी ने कहा कि फिलहाल दूध विसर्जन से जल प्रदूषण होने के संबंध में कोई वैज्ञानिक डेटा प्रस्तुत नहीं किया गया है। हालांकि, अधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1974 की धारा 24 के तहत किसी भी प्रदूषक पदार्थ को जलधाराओं में प्रवाहित करना प्रतिबंधित है।

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि दूध जैसे कार्बनिक पदार्थ पानी में जैविक ऑक्सीजन मांग (Biological Oxygen Demand – BOD) बढ़ा सकते हैं, जिससे जलीय जीवन प्रभावित हो सकता है। अधिक BOD होने पर पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है, जिसका असर मछलियों और अन्य जल जीवों पर पड़ता है।
इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को विशेषज्ञों से वैज्ञानिक अध्ययन कराने के निर्देश दिए गए हैं।
बोर्ड से पूछे गए अहम सवाल
एनजीटी ने अपनी रिपोर्ट में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब मांगे हैं। इनमें पूछा गया है कि क्या धार्मिक अवसरों पर नदी में दूध प्रवाहित करने जैसी गतिविधियां किसी वर्तमान दिशा-निर्देश के तहत नियंत्रित हैं? यदि नहीं, तो क्या इनके लिए नए दिशा-निर्देश बनाए जाने की आवश्यकता है?
इसके अलावा यह भी पूछा गया है कि क्या नदी में दूध अर्पित करने से वास्तव में जल प्रदूषण होता है और इसका नदी की पारिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ता है।
एनजीटी ने कहा कि धार्मिक परंपराओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। अदालत ने माना कि यह मामला केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि पर्यावरणीय और सार्वजनिक हित का भी विषय है।
धार्मिक परंपराएं बनाम पर्यावरण संरक्षण
भारत में नदियों को धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा जाता है। विशेष रूप से नर्मदा नदी को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। धार्मिक आयोजनों के दौरान दूध, फूल, कपड़े और अन्य सामग्री नदी में अर्पित करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।

हालांकि पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि बड़ी मात्रा में किसी भी कार्बनिक पदार्थ को नदी में प्रवाहित करने से जल की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। दूध पानी में मिलकर सड़ने लगता है, जिससे ऑक्सीजन की मात्रा घट सकती है और जल जीवों पर असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि कपड़े और अन्य सामग्री नदी में फेंकने से ठोस अपशिष्ट बढ़ता है, जो नदी की स्वच्छता और प्रवाह दोनों को प्रभावित करता है।
जुलाई में होगी अगली सुनवाई
मामले में अगली सुनवाई 17 जुलाई 2026 को होगी। तब तक केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अपनी वैज्ञानिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
अब इस मामले पर पूरे प्रदेश की नजर बनी हुई है, क्योंकि रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में धार्मिक आयोजनों के दौरान नदियों में सामग्री विसर्जन को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं।