पिता से सुने उसेन बोल्ट के किस्से, ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर की प्रैक्टिस और बन गए भारत के सबसे तेज धावक गुरिंदरवीर सिंह !

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भारतीय एथलेटिक्स को एक नया स्पीड स्टार मिल गया है। 25 वर्षीय Gurindervir Singh ने एथलेटिक्स फेडरेशन कप की 100 मीटर दौड़ में 10.09 सेकेंड का समय निकालकर इतिहास रच दिया है। इस शानदार प्रदर्शन के साथ गुरिंदरवीर भारत के सबसे तेज धावक बन गए हैं। उनकी यह उपलब्धि केवल एक रिकॉर्ड नहीं, बल्कि संघर्ष, अनुशासन और जुनून की ऐसी कहानी है जिसने लाखों युवाओं को प्रेरित किया है।

नई दिल्ली और रांची से लेकर पंजाब के गांवों तक आज हर जगह गुरिंदरवीर सिंह की चर्चा हो रही है। जिस खिलाड़ी ने कभी ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर दौड़ लगाकर अपने सपनों को जिंदा रखा, वही आज देश की ट्रैक एंड फील्ड दुनिया का नया सितारा बन चुका है।

गुरिंदरवीर सिंह की सफलता के पीछे उनके पिता कमलजीत सिंह की बड़ी भूमिका रही है। पेशे से कांस्टेबल कमलजीत अपने बेटे को बचपन से ही दुनिया के महान धावक Usain Bolt की कहानियां सुनाया करते थे। साल 2008 में जब बीजिंग ओलिंपिक में उसेन बोल्ट ने दुनिया को अपनी रफ्तार से चौंकाया था, तब 7 साल के गुरिंदरवीर टीवी पर वह रेस देख रहे थे। बोल्ट की बिजली जैसी स्पीड और गोल्ड मेडल जीतने का अंदाज उनके दिल में उतर गया। उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि एक दिन वे भी भारत के सबसे तेज धावक बनेंगे।

समय के साथ यह सपना उनका जुनून बन गया। गांव और छोटे शहर की सीमित सुविधाओं के बीच भी उन्होंने अभ्यास जारी रखा। जहां दूसरे बच्चे खेल और मनोरंजन में व्यस्त रहते थे, वहीं गुरिंदरवीर अपनी स्पीड बढ़ाने के लिए घंटों मेहनत करते थे। परिवार ने भी हर कदम पर उनका साथ दिया।

कोविड-19 महामारी के दौरान जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा, तब खिलाड़ियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती ट्रेनिंग जारी रखने की थी। स्टेडियम बंद थे, ट्रैक सूने पड़े थे और जिम पर ताले लगे थे। लेकिन गुरिंदरवीर ने हार नहीं मानी। जालंधर में अपने कोच सरबजीत सिंह हैप्पी के साथ वे चोरी-छिपे स्थानीय पार्कों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर दौड़ लगाते थे। सुबह-सुबह सुरक्षाकर्मियों की नजरों से बचकर ट्रैक तक पहुंचना और जल्दी अभ्यास पूरा कर लौट आना उनकी दिनचर्या बन चुकी थी।

कई बार हालात इतने कठिन हो जाते कि उन्हें पटियाला में कुछ दिनों के लिए होटल किराए पर लेकर रहना पड़ता, ताकि अभ्यास में कोई रुकावट न आए। सीमित संसाधनों और मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से ध्यान नहीं हटने दिया। यही संघर्ष आज उनकी सफलता की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आया है।

गुरिंदरवीर की जिंदगी में अनुशासन का महत्व भी बेहद खास रहा। साल 2017 की एशियन यूथ चैम्पियनशिप से पहले उन्होंने करीब 6 महीने तक स्मार्टफोन से दूरी बना ली थी। उस समय उनकी पूरी दुनिया सिर्फ ट्रैक, फिटनेस और अभ्यास तक सीमित थी। जहां आज के दौर में युवा सोशल मीडिया और मोबाइल फोन में समय बिताते हैं, वहीं गुरिंदरवीर ने खुद को इन सबसे दूर रखकर केवल अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया।

हालांकि सफलता का रास्ता आसान नहीं था। बैंकॉक में आयोजित एशियन यूथ चैम्पियनशिप की 100 मीटर हीट में वे आखिरी स्थान पर रहे। इस हार के बाद उन्हें तानों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि उनके रूममेट ने भी कह दिया कि वे फाइनल तक पूरा नहीं कर पाएंगे। यह बात गुरिंदरवीर के दिल को चुभ गई।

हताश होकर उन्होंने अपने पिता कमलजीत सिंह को फोन किया और कहा कि शायद वे दूसरा या तीसरा स्थान हासिल कर लें। बेटे की बात सुनकर पिता ने उन्हें डांटते हुए कहा, “अगर सोच ही दूसरे-तीसरे की है, तो पहला स्थान कभी नहीं मिलेगा।” पिता के यही शब्द गुरिंदरवीर के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा बन गए। अगले ही दिन उन्होंने ट्रैक पर उतरकर शानदार प्रदर्शन किया और गोल्ड मेडल जीतकर सभी आलोचकों को जवाब दे दिया।

आज जब गुरिंदरवीर सिंह ने 10.09 सेकेंड में 100 मीटर दौड़ पूरी कर भारत के सबसे तेज धावक बनने का रिकॉर्ड बनाया है, तब उनकी यह उपलब्धि सिर्फ व्यक्तिगत जीत नहीं बल्कि संघर्ष और आत्मविश्वास की मिसाल बन चुकी है। उनकी कहानी यह साबित करती है कि यदि इरादे मजबूत हों तो सीमित संसाधन और कठिन परिस्थितियां भी रास्ता नहीं रोक सकतीं।

भारत में एथलेटिक्स लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है और गुरिंदरवीर सिंह जैसे खिलाड़ी देश के युवाओं के लिए नई उम्मीद बनकर उभर रहे हैं। जिस बच्चे ने कभी टीवी पर उसेन बोल्ट को देखकर सपना देखा था, आज वही बच्चा लाखों भारतीयों के लिए प्रेरणा बन चुका है। आने वाले अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में अब पूरे देश की नजरें गुरिंदरवीर सिंह पर टिकी रहेंगी, क्योंकि भारत को उम्मीद है कि यह युवा धावक एक दिन ओलिंपिक के ट्रैक पर भी तिरंगा लहराएगा।

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