बैरसिया, ग्राम आकिया। अंधविश्वास और लापरवाही कभी-कभी मासूम बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। इसी का एक ताजा उदाहरण बैरसिया के ग्राम आकिया में जन्मी 15 दिन की नवजात बच्ची है। जन्म के तुरंत बाद बच्ची का वजन लगातार घटने लगा और स्वास्थ्य बिगड़ने के बावजूद परिवार झाड़-फूंक पर भरोसा कर आधुनिक चिकित्सा से परहेज करता रहा।
जन्म के समय बच्ची का वजन 2.5 किलो था, जो सामान्य माना जाता है। लेकिन जन्म के सातवें दिन यह घटकर 2.10 किलो और दसवें दिन 1.7 किलो तक पहुँच गया। यह स्थिति नवजात के लिए गंभीर खतरे की घंटी थी।

आशा कार्यकर्ता ने समय रहते दी चेतावनी
गांव की आशा कार्यकर्ता सुमन लोवंशी, जो गृह आधारित शिशु स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम के तहत नियमित रूप से मां और नवजात की निगरानी कर रही थीं, ने बच्ची की लगातार गिरती वजन और बिगड़ते स्वास्थ्य को देखा। पहले ही दौरे में उन्होंने मां को स्तनपान और पोषण संबंधी जरूरी परामर्श दिया, लेकिन बच्ची के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ।
तीसरे दिन जब बच्ची का वजन और कम पाया गया, तो सुमन लोवंशी ने इसे सामान्य कमजोरी नहीं बल्कि गंभीर खतरे के रूप में देखा। उन्होंने तुरंत आशा सुपरवाइजर को सूचना दी और परिवार को अस्पताल ले जाने की सलाह दी। शुरुआती इनकार के बावजूद आशा कार्यकर्ता ने हार नहीं मानी और मामला सीएमएचओ कार्यालय तक पहुंचाया।
सिस्टम की सक्रियता और एंबुलेंस से अस्पताल में भर्ती
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) भोपाल के निर्देश पर ब्लॉक स्तरीय स्वास्थ्य टीम सक्रिय हुई। सामूहिक समझाइश और प्रशासनिक सहयोग के बाद 26 दिसंबर को बच्ची को 108 एंबुलेंस के माध्यम से कमला नेहरू अस्पताल, भोपाल में भर्ती कराया गया।

अस्पताल में इलाज और सुधार
अस्पताल में नवजात को पोषण, दवाइयां और विशेष देखभाल दी गई। कुछ ही दिनों में बच्ची का वजन और स्वास्थ्य बेहतर होने लगे, जिससे परिवार ने राहत की सांस ली। इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि अंधविश्वास और समय पर इलाज न कराना नवजातों के लिए जानलेवा हो सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का संदेश
नवजात में वजन का तेजी से घटना हमेशा गंभीर संकेत होता है। ऐसे मामलों में तुरंत चिकित्सीय सहायता लेना जरूरी है। सीएमएचओ भोपाल डॉ. मनीष शर्मा ने बताया कि गृह आधारित शिशु स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम के तहत आशा कार्यकर्ता जन्म के बाद नियमित अंतराल पर घर-घर जाकर बच्चों की स्थिति का आकलन करती हैं और समय पर उपचार सुनिश्चित कर शिशु मृत्यु दर कम करने में मदद करती हैं।
यह मामला आशा कार्यकर्ताओं की सजगता और समय पर सही कदम उठाने की अहमियत को उजागर करता है। एक मासूम की जान बचाने में उनकी मेहनत और प्रशासनिक सहयोग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।