भोपाल में जैन समाज का मौन आक्रोश: “साध्वियों की मौत नहीं, अहिंसा पर हमला”, संत सुरक्षा कानून की उठी मांग !

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भोपाल। भोपाल में सोमवार को जैन समाज ने रीवा में दो आर्यिका माताओं की सड़क दुर्घटना में हुई मौत के विरोध में विशाल मौन रैली निकाली। सफेद वस्त्रों में हजारों समाजजन हाथों में तख्तियां और काली पट्टियां बांधकर सड़कों पर उतरे और घटना को महज हादसा नहीं बल्कि सुनियोजित हिंसक कृत्य बताते हुए दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की। समाज के लोगों ने एक स्वर में कहा— “यह केवल दो साध्वियों की मौत नहीं, बल्कि अहिंसा और सनातन आध्यात्मिक परंपरा पर हमला है।”

जैन समाज के विभिन्न संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और सामाजिक संगठनों के संयुक्त नेतृत्व में निकाली गई यह मौन रैली शहर के प्रमुख मार्गों से होकर गुजरी। रैली में महिलाओं, युवाओं, बुजुर्गों और बच्चों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। पूरे प्रदर्शन के दौरान लोगों ने शांति बनाए रखी, लेकिन उनके हाथों में लिखे संदेश प्रशासन के प्रति गहरा आक्रोश जाहिर कर रहे थे।

यह विरोध प्रदर्शन रीवा में 20 मई को हुई उस दर्दनाक घटना के बाद आयोजित किया गया, जिसमें पूज्य आचार्य विद्यासागर जी महाराज की शिष्याएं आर्यिका श्रुतमती माताजी और आर्यिका उपशममती माताजी की सड़क हादसे में मौत हो गई थी। जानकारी के अनुसार दोनों संत पैदल विहार कर रही थीं, तभी तेज रफ्तार वाहन ने उन्हें टक्कर मार दी। घटना में दोनों की मौके पर ही मौत हो गई।

जैन समाज का आरोप है कि उपलब्ध वीडियो फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों की जानकारी इस घटना को सामान्य सड़क दुर्घटना नहीं बल्कि एक गंभीर और संदिग्ध वारदात की ओर इशारा करती है। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि वाहन चालक ने निहत्थी संतों को देखकर भी वाहन नहीं रोका और टक्कर मारने के बाद मौके से फरार हो गया।

रैली के दौरान समाजजनों ने “अहिंसा पर हमला बंद करो”, “संतों की सुरक्षा सुनिश्चित करो” और “दोषियों को फांसी दो” जैसे नारे लिखी तख्तियां हाथों में लेकर प्रदर्शन किया। कई लोगों की आंखों में आंसू थे और वे इस घटना को पूरे जैन समाज की आस्था पर चोट बता रहे थे।

राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ और अन्य जैन संगठनों ने संयुक्त रूप से सरकार को ज्ञापन सौंपते हुए मामले की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग की। ज्ञापन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मध्यप्रदेश सरकार को संबोधित करते हुए प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपा गया।

समाज ने मांग की कि पूरे मामले की जांच एसआईटी या न्यायिक आयोग से कराई जाए ताकि घटना के पीछे की वास्तविक सच्चाई सामने आ सके। साथ ही सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की मांग भी की गई, ताकि जांच प्रभावित न हो।

ज्ञापन में यह भी मांग की गई कि आरोपी चालक और यदि कोई अन्य साजिशकर्ता शामिल हो तो उन पर हत्या की धारा 302 के तहत मामला दर्ज किया जाए। समाज का कहना है कि यदि यह केवल हादसा होता तो वाहन चालक मौके से भागता नहीं।

रैली में शामिल वक्ताओं ने कहा कि जैन साधु-संत पूरी तरह अहिंसक जीवन जीते हैं। वे पैदल विहार करते हैं, किसी प्रकार की सुरक्षा या सुविधा का उपयोग नहीं करते। ऐसे में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना शासन और प्रशासन की नैतिक जिम्मेदारी है। बार-बार हो रही ऐसी घटनाएं समाज के भीतर भय और असुरक्षा की भावना पैदा कर रही हैं।

समाज ने “राष्ट्रीय संत सुरक्षा नीति” लागू करने की मांग भी जोर-शोर से उठाई। उनका कहना है कि देशभर में पैदल विहार करने वाले संतों के लिए विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल बनाया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं को रोका जा सके।

जैन समाज ने यह भी मांग रखी कि संतों और धार्मिक व्यक्तियों के खिलाफ होने वाले अपराधों को विशेष संवेदनशील श्रेणी में रखा जाए तथा ऐसे मामलों की सुनवाई फास्ट-ट्रैक कोर्ट में की जाए। समाज का मानना है कि यदि त्वरित और कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो अपराधियों के हौसले बढ़ेंगे।

मौन रैली के दौरान शहर में कई स्थानों पर लोगों ने आर्यिका माताओं को श्रद्धांजलि भी अर्पित की। समाज के लोगों ने दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत संतों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

रैली में शामिल समाजजनों ने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही निष्पक्ष जांच और कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर देशव्यापी आंदोलन, चक्का जाम, जेल भरो आंदोलन और भारत बंद जैसे कदम भी उठाए जाएंगे।

प्रदर्शन के दौरान कई वक्ताओं ने कहा कि आज यदि संत और साध्वियां भी सुरक्षित नहीं हैं, तो यह पूरे समाज और शासन व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने सरकार से मांग की कि धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं की रक्षा के लिए ठोस नीति बनाई जाए।

भोपाल में निकली यह मौन रैली अब केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं रही, बल्कि संत सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दे पर देशव्यापी बहस का रूप लेती दिखाई दे रही है। जैन समाज का कहना है कि जब तक दोषियों को सजा नहीं मिलती और संतों की सुरक्षा के लिए मजबूत कानून नहीं बनता, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।

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