मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगा हलफनामा !

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जबलपुर। मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी और उससे प्रभावित हो रही शिक्षा व्यवस्था को लेकर अब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने प्रदेश में शिक्षकों की स्थिति पर चिंता जाहिर की और राज्य सरकार से विस्तृत जानकारी हलफनामे के साथ प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 24 फरवरी को होगी।

यह जनहित याचिका डिंडौरी निवासी किसान लोक सिंह की ओर से दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू हुए 15 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, इसके बावजूद प्रदेश सरकार कई सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति के अपने वैधानिक दायित्व का पालन नहीं कर पाई है। याचिका के अनुसार प्रदेश में 102 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां एक भी शिक्षक पदस्थ नहीं है, जबकि 499 स्कूलों में शिक्षकीय स्टाफ की भारी कमी है।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राहुल देशमुख ने कोर्ट को बताया कि शिक्षकों की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है और छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है। जब इस मुद्दे पर अदालत मित्र ने डिंडौरी जिले के सरकारी स्कूलों की स्थिति का उल्लेख किया, तो मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार से पूछा कि प्रदेश में कुल कितने सरकारी स्कूल संचालित हैं और उनमें शिक्षकों के कितने पद स्वीकृत तथा कितने रिक्त हैं।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गुलाटी ने कोर्ट को अवगत कराया कि अकेले जबलपुर जिले में ही 54 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जो शिक्षकों की कमी के चलते बंद होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि राज्य सरकार से यह स्पष्ट जानकारी मांगी जाए कि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के कुल कितने पद खाली हैं, ताकि उन्हें भरने के लिए न्यायालय आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर सके।

याचिका और सुनवाई के दौरान प्रस्तुत आंकड़े शिक्षा व्यवस्था की गंभीर स्थिति को उजागर करते हैं। जानकारी के अनुसार 2024-25 और 2025-26 के सत्र में प्रदेश के कई सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या लगातार घट रही है। मध्यप्रदेश में करीब 21,193 माध्यमिक विद्यालय ऐसे हैं, जहां 20 से भी कम छात्र अध्ययनरत हैं। वहीं राज्य के लगभग 8,533 स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे हैं।

खेल शिक्षकों की स्थिति और भी चिंताजनक बताई गई है। प्रदेश के करीब 92 हजार स्कूलों के लिए मात्र 700 खेल शिक्षक उपलब्ध हैं। यू-डाइस (UDISE) की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 20 स्कूल ऐसे हैं, जहां एक भी शिक्षक पदस्थ नहीं है, जबकि 4,128 स्कूलों में केवल एक शिक्षक कार्यरत है। इसके अलावा 5,179 स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या 10 से भी कम रह गई है।

सरकारी स्कूलों में घटते नामांकन की स्थिति भी गंभीर है। आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष सरकारी स्कूलों में 3.44 लाख कम विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया है। हर साल नामांकन में गिरावट का सिलसिला जारी है, जो शिक्षा की गुणवत्ता और संसाधनों की कमी की ओर इशारा करता है।

एक अन्य जानकारी के मुताबिक मध्यप्रदेश में वर्तमान में 70 हजार से अधिक शिक्षकों के पद रिक्त हैं। हालांकि हाल ही में मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मंडल (MPESB) ने 13,089 प्राथमिक शिक्षकों और 10,758 माध्यमिक शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की है। इनमें से कुछ पद जबलपुर जिले के लिए भी निर्धारित किए गए हैं, लेकिन इन भर्तियों के पूर्ण होने तक शिक्षा व्यवस्था पर संकट बना रहने की आशंका जताई जा रही है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि शिक्षकों की कमी जैसे गंभीर मुद्दे पर सरकार को जवाबदेह ठहराया जाएगा। अब 24 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई में राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत हलफनामे के आधार पर कोर्ट आगे की दिशा तय करेगा।

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