लाल किला मैदान में 24 मई को होगा ‘जनजातीय सांस्कृतिक समागम’, मुख्य अतिथि होंगे अमित शाह !

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देश की राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक लाल किला मैदान 24 मई को एक विशाल जनजातीय सांस्कृतिक आयोजन का साक्षी बनने जा रहा है। यहां आयोजित होने वाले ‘जनजातीय सांस्कृतिक समागम’ में देशभर से हजारों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग जुटेंगे। कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। इस समागम को जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और अधिकारों से जुड़ा एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन माना जा रहा है।

इस आयोजन में सबसे बड़ी भागीदारी मध्य प्रदेश से होने जा रही है। आयोजकों के मुताबिक प्रदेश के महाकौशल, मालवा और निमाड़ अंचलों से 10 हजार से अधिक आदिवासी समाज के लोग दिल्ली पहुंचेंगे। इसके लिए ट्रेनों में विशेष रूप से टिकट और रिजर्वेशन की व्यवस्था की गई है। गांव-गांव जाकर जनसंपर्क अभियान चलाया गया है और लोगों को कार्यक्रम के उद्देश्य और मुद्दों के बारे में जानकारी दी गई है।

समागम का आयोजन जनजातीय सुरक्षा मंच द्वारा किया जा रहा है। कार्यक्रम की अध्यक्षता मंच के राष्ट्रीय संयोजक गणेश राम भगत करेंगे। वहीं कई राज्यों से जनजातीय संगठनों के प्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता भी इस आयोजन में शामिल होंगे।

कार्यक्रम में झारखंड से राष्ट्रीय सह-संयोजक डॉ. राजकिशोर हांसदा, अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष सत्येन्द्र सिंह खरवार, पूर्व संयोजक हर्ष चौहान, बस्तर से बुधरी ताती, अरुणाचल प्रदेश से तेची गुविन, तेलंगाना से हीरा कुमार नागू और दिल्ली संयोजक अशोक कुमार गोंड समेत कई प्रमुख चेहरे मौजूद रहेंगे।

आयोजकों का कहना है कि यह केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनजातीय अस्मिता और अधिकारों की रक्षा का राष्ट्रीय मंच होगा। कार्यक्रम में जनजातीय संस्कृति, पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत, नृत्य और लोकवाद्यों की अनूठी झलक देखने को मिलेगी। मध्य प्रदेश से जाने वाले हजारों आदिवासी अपने साथ पारंपरिक मांदर, ढोल, नगाड़े और सांस्कृतिक वेशभूषा लेकर जाएंगे, ताकि दिल्ली की सड़कों पर जनजातीय संस्कृति की जीवंत तस्वीर दिखाई दे सके।

कार्यक्रम से पहले 24 मई की शाम 6 बजे दिल्ली के पांच अलग-अलग मार्गों से विशाल शोभायात्राएं निकाली जाएंगी। इनमें देश के विभिन्न राज्यों से आए जनजातीय प्रतिनिधि पारंपरिक परिधानों और लोकगीतों के साथ शामिल होंगे। आयोजकों के अनुसार यह शोभायात्रा केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन नहीं होगी, बल्कि यह संदेश भी देगी कि जनजातीय समाज अब अपनी जड़ों, संस्कृति और अधिकारों से किसी प्रकार की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करेगा।

इस समागम का सबसे बड़ा और चर्चित मुद्दा “डी-लिस्टिंग” की मांग को माना जा रहा है। मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में आदिवासी संगठनों द्वारा लंबे समय से यह मांग उठाई जा रही है। कार्यक्रम में इस विषय पर खुलकर चर्चा होने की संभावना है।

जनजातीय सुरक्षा मंच का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत यदि अनुसूचित जाति (SC) का कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है, तो उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। लेकिन अनुसूचित जनजाति (ST) के मामले में अनुच्छेद 342 में ऐसा स्पष्ट प्रावधान नहीं है। मंच का आरोप है कि इसी कारण धर्मांतरण के बाद भी कुछ लोग जनजातीय आरक्षण और अल्पसंख्यक दोनों तरह के लाभ ले रहे हैं।

संगठन का कहना है कि जो लोग अपनी पारंपरिक जनजातीय आस्था, रीति-रिवाज और संस्कृति को त्याग चुके हैं, उन्हें जनजातीय सूची से बाहर किया जाना चाहिए। इसे ही “डी-लिस्टिंग” कहा जा रहा है। मंच का दावा है कि इससे वास्तविक आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा हो सकेगी और आरक्षण का लाभ सही लोगों तक पहुंचेगा।

हालांकि इस मांग को लेकर देशभर में बहस भी तेज हो गई है। कई सामाजिक और मानवाधिकार संगठन इसे संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि धर्म परिवर्तन किसी व्यक्ति की सामाजिक और जातीय पहचान को पूरी तरह समाप्त नहीं करता। वहीं समर्थकों का तर्क है कि जनजातीय पहचान केवल जातीय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और पारंपरिक जीवनशैली से भी जुड़ी होती है।

राजनीतिक दृष्टि से भी इस कार्यक्रम को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी से इस आयोजन का महत्व और बढ़ गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी चुनावी समीकरणों और जनजातीय क्षेत्रों में बढ़ती राजनीतिक सक्रियता के बीच यह कार्यक्रम बड़ा संदेश देने वाला साबित हो सकता है।

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर राज्यों से आने वाले जनजातीय प्रतिनिधि अपने-अपने मुद्दों को भी इस मंच पर रख सकते हैं। इसमें जल-जंगल-जमीन, संस्कृति संरक्षण, शिक्षा, रोजगार और संवैधानिक अधिकारों जैसे विषय प्रमुख रहेंगे।

आयोजकों ने दावा किया है कि यह समागम देश में जनजातीय समाज का अब तक का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक जुटान साबित होगा। कार्यक्रम को लेकर जनजातीय समाज में भारी उत्साह देखा जा रहा है। गांवों में बैठकें, सांस्कृतिक अभ्यास और यात्रा की तैयारियां तेज हो गई हैं।

लाल किला मैदान में होने वाला यह आयोजन केवल सांस्कृतिक समागम नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की एकता, पहचान और अधिकारों की आवाज के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में यह कार्यक्रम राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक विमर्श का बड़ा केंद्र बन सकता है।

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