सागर में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रशासन सख्त, आत्महत्या रोकथाम के लिए बनी ठोस रणनीति !

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जिले में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर प्रशासन अब पूरी तरह सतर्क नजर आ रहा है। बढ़ते तनाव, प्रतिस्पर्धा और आत्महत्या की घटनाओं की आशंका को देखते हुए जिला प्रशासन ने ठोस कदम उठाते हुए ‘जिला स्तरीय निगरानी समिति’ की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की। यह बैठक डिप्टी कलेक्टर रजत सोनी की अध्यक्षता और समिति की सदस्य सचिव डॉ. सरोज गुप्ता की उपस्थिति में संपन्न हुई। बैठक में विद्यार्थियों को तनावमुक्त वातावरण देने और उनकी मानसिक समस्याओं का समय पर समाधान सुनिश्चित करने के लिए कई अहम निर्णय लिए गए।

बैठक के दौरान यह स्पष्ट किया गया कि स्कूल, कॉलेज और कोचिंग संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की निगरानी अब प्राथमिकता होगी। प्रशासन ने निर्देश दिए कि हर शिक्षण संस्थान में ऐसा माहौल बनाया जाए, जहां विद्यार्थी बिना डर और संकोच के अपनी समस्याएं साझा कर सकें।

प्राचार्य डॉ. सरोज गुप्ता ने बैठक में विस्तृत कार्ययोजना प्रस्तुत करते हुए उच्च शिक्षा विभाग के दिशा-निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक कॉलेज में महिला और पुरुष दोनों काउंसलर्स की नियुक्ति अनिवार्य की जाएगी, ताकि छात्र-छात्राएं अपनी मानसिक समस्याओं को सहजता से साझा कर सकें। इसके साथ ही छात्राओं के लिए नियमित रूप से स्त्री रोग विशेषज्ञ (गाइनेकोलॉजिस्ट) के व्याख्यान आयोजित करने का निर्णय लिया गया, जिससे उनकी स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता भी बढ़ेगी।

बैठक में यह भी तय किया गया कि शहर के सभी कोचिंग संस्थानों और उच्च शिक्षण संस्थानों की विस्तृत मैपिंग की जाएगी। डॉ. रोहित त्रिवेदी ने सुझाव दिया कि इन संस्थानों के प्रतिनिधियों और गैर-सरकारी संगठनों (NGO) के साथ संयुक्त बैठकें आयोजित की जाएं, ताकि विद्यार्थियों की समस्याओं का समग्र समाधान निकाला जा सके।

शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज के डॉ. मनीष कुमार सोनी ने शिक्षकों की भूमिका को अहम बताते हुए कहा कि वे छात्रों के व्यवहार में आने वाले बदलावों पर नजर रखें। यदि किसी छात्र में तनाव, अवसाद या अन्य मानसिक समस्याओं के संकेत दिखें, तो तत्काल अभिभावकों को सूचित किया जाए और आवश्यक काउंसलिंग की व्यवस्था की जाए।

बैठक में योग और मेडिटेशन को भी विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य सुधार का महत्वपूर्ण माध्यम माना गया। नागरिक समाज के प्रतिनिधि डॉ. एम.डी. त्रिपाठी और डॉ. जाहन्वी मुखारया ने सुझाव दिया कि शिक्षण संस्थानों में नियमित रूप से योग, ध्यान और प्रेरणात्मक सत्र आयोजित किए जाएं। इससे विद्यार्थियों में सकारात्मक सोच विकसित होगी और वे तनाव से बेहतर तरीके से निपट सकेंगे।

इसके साथ ही सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और उससे होने वाली डिजिटल एंग्जायटी को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई। समिति ने निर्णय लिया कि विद्यार्थियों को सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए विशेष जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे। इन अभियानों के माध्यम से छात्रों को डिजिटल संतुलन बनाए रखने और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

बैठक में दिव्यांग विद्यार्थियों और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए भी विशेष योजनाएं बनाने पर जोर दिया गया। सामाजिक न्याय विभाग के आदर्श सैलार और आदिवासी विकास विभाग की मुस्कान खान ने सुझाव दिया कि दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए विशेष कौशल विकास (स्किल डेवलपमेंट) कार्यक्रम आयोजित किए जाएं, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें और समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें।

प्रशासन ने शिक्षकों को यह भी निर्देश दिए कि वे तनावग्रस्त छात्रों की पहचान कर उनकी नियमित काउंसलिंग सुनिश्चित करें। साथ ही, अभिभावकों को भी इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया जाएगा, ताकि घर और संस्थान दोनों स्तर पर छात्रों को सहयोग मिल सके।

बैठक में डिप्टी कलेक्टर रजत सोनी, प्राचार्य डॉ. सरोज गुप्ता, बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के डॉ. रोहित त्रिवेदी, इंजीनियरिंग कॉलेज के डॉ. मनीष कुमार सोनी, सामाजिक न्याय विभाग के आदर्श सैलार, आदिवासी विकास विभाग की मुस्कान खान तथा अन्य सदस्य मौजूद रहे।

कुल मिलाकर, यह पहल विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रशासन की इस रणनीति से न केवल छात्रों में आत्मविश्वास बढ़ेगा, बल्कि आत्महत्या जैसी गंभीर प्रवृत्तियों पर भी प्रभावी नियंत्रण लगाया जा सकेगा।

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