नई दिल्ली।
अनिल अंबानी और उनके समूह पर चल रहे कथित बैंकिंग और कॉर्पोरेट फ्रॉड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए शुक्रवार को नए नोटिस जारी किए हैं। यह कार्रवाई अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (ADAG) और उससे जुड़ी कंपनियों के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान की गई।
इस PIL में करीब 1.5 लाख करोड़ रुपए के कथित बैंकिंग और कॉर्पोरेट फ्रॉड की कोर्ट-मॉनिटर्ड जांच की मांग की गई है। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने CBI और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को निर्देश दिया है कि वे अनिल अंबानी के खिलाफ चल रही जांच की सीलबंद स्टेटस रिपोर्ट 10 दिन के भीतर दाखिल करें।

सुनवाई की 5 अहम बातें
1. अनिल अंबानी को आखिरी चेतावनी
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि अनिल अंबानी को पहले भी नोटिस भेजे जा चुके हैं। अब कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को व्यक्तिगत रूप से यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया है कि नोटिस सीधे अनिल अंबानी तक पहुंचें। इसे कोर्ट की ओर से अंतिम और गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
2. जांच एजेंसियों को 10 दिन की डेडलाइन
सुप्रीम कोर्ट ने CBI और ED को निर्देश दिया कि वे मौजूदा जांच की पूरी स्थिति पर सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट दाखिल करें। कोर्ट ने साफ किया कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जाएगी।

3. प्रशांत भूषण का बड़ा दावा
याचिकाकर्ता, पूर्व IAS अधिकारी ई.ए.एस. सरमा, की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इसे “भारत के इतिहास का सबसे बड़ा कॉर्पोरेट फ्रॉड” बताया। उन्होंने दावा किया कि कथित धोखाधड़ी 2007-08 से चल रही थी, लेकिन CBI ने FIR 2025 में जाकर दर्ज की।
4. बैंक अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
प्रशांत भूषण ने कोर्ट के सामने आरोप लगाया कि जांच एजेंसियां उन बैंक अधिकारियों की भूमिका की गंभीरता से जांच नहीं कर रहीं, जिन्होंने कथित तौर पर अनिल अंबानी समूह को फंड डायवर्जन में मदद की। उन्होंने कहा कि बिना बैंक अधिकारियों की मिलीभगत के इतना बड़ा घोटाला संभव नहीं था।
5. सार्वजनिक धन की हेराफेरी का आरोप
PIL में आरोप लगाया गया है कि सार्वजनिक बैंकों और वित्तीय संस्थानों से लिए गए पैसों का व्यवस्थित तरीके से दुरुपयोग किया गया और फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स में हेराफेरी कर असली स्थिति छिपाई गई।

10,117 करोड़ की संपत्तियां जब्त, पाली हिल वाला घर भी शामिल
इस मामले में अब तक 10,117 करोड़ रुपए की संपत्तियां जब्त की जा चुकी हैं। इनमें मुंबई के पाली हिल स्थित अनिल अंबानी का आलीशान घर भी शामिल है।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने नवंबर में की गई कार्रवाई में मुंबई के बॉलार्ड एस्टेट स्थित रिलायंस सेंटर, बैंक बैलेंस, फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और अनलिस्टेड निवेश समेत 18 संपत्तियों को अस्थायी रूप से अटैच किया है।
इसके अलावा:
- रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की 7 संपत्तियां
- रिलायंस पावर की 2 संपत्तियां
- रिलायंस वैल्यू सर्विसेज की 9 संपत्तियां
को भी फ्रीज किया गया है। ED ने समूह से जुड़ी अन्य कंपनियों जैसे रिलायंस वेंचर एसेट मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड और फाई मैनेजमेंट सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के FD और निवेश भी अटैच किए हैं।
यस बैंक निवेश और NPA बनने की पूरी कहानी
ED की जांच में सामने आया है कि रिलायंस होम फाइनेंस (RHFL) और रिलायंस कॉमर्शियल फाइनेंस (RCFL) में बड़े पैमाने पर फंड्स का दुरुपयोग हुआ।
- 2017 से 2019 के बीच
- यस बैंक ने RHFL में 2,965 करोड़ रुपए
- RCFL में 2,045 करोड़ रुपए
का निवेश किया।
लेकिन दिसंबर 2019 तक यह पूरा निवेश नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) में बदल गया।
- RHFL पर बकाया: 1,353 करोड़
- RCFL पर बकाया: 1,984 करोड़
कुल मिलाकर यस बैंक को 2,700 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ।
लोन अप्रूवल में गंभीर अनियमितताएं
ED के अनुसार, जांच में लोन अप्रूवल प्रक्रिया में चौंकाने वाली गड़बड़ियां सामने आईं:
- कई लोन एक ही दिन में अप्लाई, अप्रूव और डिस्बर्स कर दिए गए
- फील्ड वेरिफिकेशन और मीटिंग्स नहीं की गईं
- कई दस्तावेज ब्लैंक या बिना तारीख के पाए गए
ED ने इसे “इंटेंशनल कंट्रोल फेल्योर” करार दिया है। जांच PMLA की धारा 5(1) के तहत चल रही है और 31 अक्टूबर 2025 को अटैचमेंट ऑर्डर जारी किए गए।
CBI-ED की कार्रवाई पर भी सवाल
PIL में कहा गया है कि CBI की 21 अगस्त की FIR और ED की कार्रवाई कथित फ्रॉड के सिर्फ एक छोटे हिस्से को ही कवर करती है। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने CBI और ED की ओर से पेश होकर स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के लिए समय मांगा, जिसे कोर्ट ने सीमित अवधि के लिए स्वीकार कर लिया।
आगे की सुनवाई पर टिकी निगाहें
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को तीन हफ्ते बाद दोबारा सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। माना जा रहा है कि CBI और ED की सीलबंद रिपोर्ट के बाद कोर्ट यह तय करेगा कि जांच का दायरा बढ़ाया जाए या कोर्ट-मॉनिटर्ड जांच की जरूरत है या नहीं।
यह मामला न केवल अनिल अंबानी समूह, बल्कि देश के बैंकिंग सिस्टम और कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर भी दूरगामी असर डाल सकता है।