सागर में भारतीय ज्ञान परंपरा का उत्थान, विद्वानों ने रखे सारगर्भित विचार !

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पं. दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य (अग्रणी) महाविद्यालय, सागर में गुरुवार को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ। विषय था: भारतीय ज्ञान परंपरा में महामाहेश्वर अभिनवगुप्त का योगदान। मध्यप्रदेश शासन, उच्च शिक्षा विभाग एवं पी.एम. ऊषा योजना के सहयोग से आयोजित इस शैक्षिक पर्व की शुरुआत आदिगुरु शंकराचार्य सभागार में गरिमामय वातावरण के बीच हुई। उद्देश्य स्पष्ट था: कश्मीर के महान तत्त्वचिंतक, शैव दार्शनिक, रस सिद्धांतकार व योगी अभिनवगुप्त को आधुनिक दृष्टि से पुनर्परिभाषित करना और उनके विचारों को समकालीन परिप्रेक्ष्य में समझना।

उद्घाटन सत्र में उच्च शिक्षा विभाग के क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालक डॉ. नीरज दुबे मुख्य अतिथि रहे, जबकि अध्यक्षता रानी अवंती बाई लोधी विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. विनोद मिश्र ने की। मंचासीन प्राधिकरण में प्राचार्य डॉ. सरोज गुप्ता, प्रशासनिक अधिकारी डॉ. इमराना सिद्दीकी, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय भोपाल के निदेशक डॉ. रमाकांत पांडे, अगस्त्य संस्थान भोपाल के अध्यक्ष पं. प्रभु दयाल मिश्रा तथा महर्षि योगी वैदिक विश्वविद्यालय भोपाल के विद्वान आचार्य डॉ. नीलिम्प त्रिपाठी शामिल रहे।

मुख्य अतिथि डॉ. नीरज दुबे ने अभिनवगुप्त को विचार और अध्यात्म के दुर्लभ संगम का स्वरूप बताते हुए कहा कि वे मात्र शैव दर्शन के प्रवर्तक ही नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन की विराट धारा में दार्शनिकता और अध्यात्म का अद्वितीय प्रतिमान हैं। उन्होंने इस विषय चयन की सराहना की और कहा कि आज के समय में ऐसे विमर्श युवा मनों में संवेदना और विवेक का प्रशिक्षण देते हैं।

अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. विनोद मिश्र ने अभिनवगुप्त को साक्षात् मार्तण्ड की उपाधि से विभूषित किए जाने का उल्लेख करते हुए शांत रस की व्याख्या पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अभिनवगुप्त का दर्शन केवल अध्ययन नहीं, बल्कि अनुभूति की तपस्या है।

संगोष्ठी की शुरुआत में प्राचार्य डॉ. सरोज गुप्ता ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि का अद्भुत संगम है और अभिनवगुप्त इस धारा के उज्ज्वल नक्षत्र हैं।
डॉ. रमाकांत पांडे ने विषय प्रवर्तन में स्पष्ट किया कि अभिनवगुप्त का दर्शन अद्वैत से भिन्न है, जहां ब्रह्म और जगत दोनों सत्य हैं।

आचार्य डॉ. नीलिम्प त्रिपाठी ने शांत रस की अवधारणा के माध्यम से सौन्दर्यशास्त्र की पुनर्व्याख्या प्रस्तुत की।
पं. प्रभु दयाल मिश्रा ने वैष्णव और शैव परंपराओं के दार्शनिक संवाद पर प्रकाश डाला।

उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. अवधेश प्रताप सिंह ने किया और आभार डॉ. इमराना सिद्दीकी ने व्यक्त किया।

इसके पश्चात प्रथम विचार सत्र में तंत्र, दर्शन, संगीत, नाट्यशास्त्र एवं साहित्य में अभिनवगुप्त की भूमिका पर विस्तृत चर्चा हुई। इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. योगेश शर्मा (IGNCA, नई दिल्ली) ने की और मुख्य वक्ता डॉ. प्रदीप शास्त्री (MGI वर्धा) रहे। सारस्वत उद्बोधनों में डॉ. नीता खन्ना, डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी, डॉ. आनंद तिवारी तथा डॉ. सर्वेश त्रिपाठी के विचारों से श्रोतागण अभिभूत हुए। संचालन डॉ. राणा कुंजर सिंह ने किया।

कार्यक्रम में प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की व्यापक उपस्थिति रही जिसमें डॉ गोपा जैन, डॉ जयकुमार सोनी, डॉ अमर कुमार जैन, डॉ संगीता मुखर्जी सहित बड़ी संख्या में विद्वानों ने सहभागिता दर्ज की। दो दिवसीय इस बौद्धिक आयोजन में देश के विभिन्न प्रांतों से आए विद्वान अगली कड़ी में अभिनवगुप्त के दार्शनिक आयामों पर और गहन विमर्श करेंगे।

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