सतना में सरदार पटेल जयंती पर आयोजित कार्यक्रम उस समय चर्चा का केंद्र बन गया, जब श्रद्धा और सम्मान के इस मंच पर राजनीति का तापमान अचानक असंतोष और अपमान की तरफ मुड़ गया। भाजपा सांसद गणेश सिंह द्वारा नगर निगम कर्मचारी को थप्पड़ मारने की घटना ने समारोह की गंभीरता को एक क्षण में धुंधला कर दिया। वीडियो वायरल हुआ और फिर सोशल मीडिया से सियासी गलियारों तक मामला गरमाता चला गया।
माल्यार्पण से विवाद तक का सफर
शुक्रवार सुबह सांसद गणेश सिंह ‘रन फॉर यूनिटी’ कार्यक्रम में शामिल हुए। उसके बाद वे सेमरिया चौक पहुंचे, जहां डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण का कार्यक्रम था। सांसद और अन्य नेता हाइड्रोलिक क्रेन के बॉक्स में चढ़कर ऊपर गए।
जब वापसी के दौरान मशीन अचानक बीच में झटके से रुक गई तो सांसद कुछ क्षण हवा में झूलते रह गए। अचानक मशीन हिली और असंतुलन की स्थिति बन गई। हालांकि स्थिति को नियंत्रित कर लिया गया, मगर सांसद का संतुलन तब बिगड़ा जब वे नीचे आए।
सार्वजनिक थप्पड़, सियासी तूफान
नीचे उतरते ही सांसद ने क्रेन ऑपरेटर गणेश कुशवाहा को बुलाया, उसका हाथ पकड़कर नाराजगी जताई और फिर सबके सामने थप्पड़ दे मारा। वहां मौजूद लोग, अधिकारी और भाजपा कार्यकर्ता यह दृश्य देखते रह गए। किसी ने इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो बना लिया, जो तेजी से वायरल हो गया।
भाजपा नेत्री नीता सोनी ने तो इस से भी आगे बढ़कर कहा कि “सांसद ने तो केवल थप्पड़ मारा है, उसके हाथ-पैर तोड़ देना चाहिए।” यह बयान आग में घी जैसा साबित हुआ।
ऑपरेटर ने बताया तकनीकी कारण
ऑपरेटर गणेश कुशवाहा, जो नगर निगम की विद्युत शाखा में मस्टर कर्मचारी है, ने स्थिति साफ करते हुए बताया कि केबिन में दो लोगों की क्षमता होती है और औसतन 125 किलो वजन तक सहन कर सकता है। लेकिन माल्यार्पण के दौरान केबिन में सांसद के साथ राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी और भाजपा जिला अध्यक्ष भगवती पांडे भी मौजूद थे।
वजन बढ़ने पर पहले ही आपत्ति जताई गई थी। लौटते समय तकनीकी संतुलन बिगड़ा और जर्क आया। थप्पड़ पर प्रतिक्रिया देते हुए कुशवाहा ने सहजता से कहा, “ये सब चलता है।” हालांकि यह वाक्य सिस्टम और सत्ता की मनोवृत्ति की गहरी झलक भी देता है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
कांग्रेस ने इस घटना को सत्ता के अहंकार का प्रतीक बताया। प्रदेश प्रवक्ता अभिनव बरौलिया ने कहा कि एक जनप्रतिनिधि द्वारा कर्मचारी को थप्पड़ मारना बताता है कि भाजपा नेताओं में जनता के प्रति संवेदनशीलता नहीं, बल्कि अहंकार हावी है।
प्रशासन और राजनीति के बीच सम्मान का सवाल
यह घटना सिर्फ एक थप्पड़ नहीं थी। यह कार्यस्थल सम्मान, लोकतांत्रिक मर्यादा और जनप्रतिनिधियों के व्यवहार का प्रश्न बन गई है। सरदार पटेल जयंती जैसे अवसर पर, जहां संदेश एकता और अनुशासन का था, वहां क्रेन की मशीनरी से ज्यादा मानवीय संयम का ब्रेक फेल होता दिखा।
यह दृश्य याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव और कुर्सियों से नहीं चलता, बल्कि व्यवहार, धैर्य और इंसानियत की ईंटों पर टिकता है। जनता प्रतिनिधियों को चढ़ाने के लिए नहीं चुनती कि वे नीचे उतरते समय किसी को गिरा दें।