बीना की सुबह जैसे भक्ति के सुरों से रंगी हो, हवा में तुलसी की सुवास घुली हो और आस्था दीपक की लौ की तरह शांत, तेजस्वी और स्थिर हो। कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसर पर बुधवार को मां जागेश्वरी धाम परिसर में आध्यात्मिक परंपराओं का भव्य समापन हुआ। लगभग एक माह से नगर में चल रही राधे-राधे प्रभात फेरी मंडल की तुलसी आरती और दीपदान परंपरा विधि-विधान के साथ पूर्ण हुई।
एक माह की भक्तिमयी यात्रा का समापन
14 वर्षों से जारी यह परंपरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भक्ति का अनुशासन है। कार्तिक मास के प्रारंभ से प्रतिदिन प्रभात फेरी नगर भ्रमण करती रही और बुधवार को मां जागेश्वरी धाम में इसका मंगल समापन हुआ। पूरे माह नगर की मातृशक्ति ने अपने आंगन की तुलसी को प्रणाम कर दीपदान किया और फिर प्रभात फेरी में सम्मिलित होकर धर्म की इस ज्योति को आगे बढ़ाया।

शालिग्राम-तुलसी विवाह और शोभायात्रा
कार्तिक मास के अंतिम दिवस पर भगवान शालिग्राम और तुलसी महारानी के दिव्य विवाह के उपरांत शोभायात्रा निकाली गई। यह यात्रा नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई मां जागेश्वरी धाम पहुंची। मार्ग में भक्तों द्वारा पुष्पवृष्टि और हरि-नाम संकीर्तन से वातावरण पवित्र होता रहा। जैसे शहर ने अपनी सुबह को भक्ति के रंग से सजाया हो।

दीपों से जगमगाया धाम
धाम परिसर पहुंचकर पहले कार्तिक माह की महिमा पर कथा हुई। इसके बाद सैकड़ों दीप जलाकर दीपदान किया गया। दीपों की कतारें मानो धरती पर उतरी आकाशगंगा जैसी प्रतीत हो रही थीं। परिसर “राधे-राधे” और “हरि बोल” के जयघोष से गूंज उठा।
धर्म, दर्शन और आध्यात्मिक संदेश
भक्त माली ने बताया कि कार्तिक माह भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इस मास में व्रत, दीपदान और तुलसी की आराधना से जीवन में शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
डॉ. रूपनारायण प्रभु ने भक्तों के साथ दीपदान कर इसका आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि एक दीप केवल मिट्टी का पात्र नहीं, बल्कि आशा, करुणा और धर्म की लौ है।

पंडित प्रकाश नारायण तिवारी ने कार्तिक पूर्णिमा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह दिन देव दीपोत्सव, त्रिपुरारी पूनम और गुरु नानक जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। उन्होंने पुराणों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस दिन आकाशदीप अर्पित करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति और जीवन में शुभता का वास होता है।
भक्तिमय वातावरण में सम्पन्न हुआ आयोजन
कार्यक्रम में भारी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। दीपों की रोशनी से झिलमिलाता मंदिर परिसर, मंत्रोच्चार से गूंजता वातावरण और भक्तों का उत्साह देखकर ऐसा लग रहा था मानो बीना ने अपनी आत्मा को प्रकाश में नहला दिया हो।

यह केवल एक धार्मिक समापन नहीं था, बल्कि इस बात का प्रमाण था कि जब समाज एक दीपक की लौ की तरह मिलकर जलता है, तो उसका उजाला दूर-दूर तक फैलता है।
बीना ने इस पावन पर्व पर फिर साबित किया कि परंपराएं केवल निभाई नहीं जातीं, उन्हें जिया जाता है।