नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली की हवा को यूं ही जहरीला नहीं कहा जाता। विशेषज्ञों के अनुसार दिल्ली की हवा में 19 तरह के हानिकारक तत्व मौजूद हैं, जिनमें से कई कैंसरकारी हैं, जबकि कुछ ऐसे तत्व हैं जो सांस, हृदय और अन्य गंभीर बीमारियों के खतरे को कई गुना बढ़ा देते हैं। यही वजह है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण अब केवल पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बन चुका है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन जहरीले तत्वों के स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण किया जाए, तो इनके दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। हालांकि, वर्तमान में प्रदूषण का आकलन ज्यादातर PM10 और PM2.5 के स्तर के आधार पर ही किया जाता है, जो केवल कणों के आकार की जानकारी देता है, न कि उनमें मौजूद जहरीले रसायनों की पूरी तस्वीर।

क्या है PM10 और PM2.5 का खतरा
PM10 वे प्रदूषक कण होते हैं जिनका व्यास 10 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये कण नाक और गले तक आसानी से पहुंच जाते हैं और सांस संबंधी समस्याएं पैदा करते हैं। वहीं, PM2.5 कण इससे भी ज्यादा खतरनाक माने जाते हैं। इनका आकार बेहद सूक्ष्म होता है और ये सीधे फेफड़ों के अंदर गहराई तक पहुंच सकते हैं।
PM2.5 कणों की बारीकी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ये इंसानी बाल की मोटाई से करीब 30 गुना छोटे होते हैं। इतनी सूक्ष्मता के कारण ये सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और फेफड़ों के साथ-साथ रक्त प्रवाह में भी मिल सकते हैं। इससे दमा, ब्रोंकाइटिस, दिल की बीमारियां, स्ट्रोक और कैंसर जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
सिर्फ आंकड़े नहीं, ज़हर की असली तस्वीर
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल PM10 और PM2.5 का स्तर बताना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इन कणों के साथ भारी धातुएं, जहरीली गैसें और अन्य रासायनिक तत्व भी जुड़े होते हैं। दिल्ली की हवा में पाए जाने वाले कई तत्व लंबे समय तक शरीर में जमा होकर धीरे-धीरे गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं।
समाधान क्या है
जानकारों के अनुसार वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्य, औद्योगिक उत्सर्जन, कूड़ा जलाना और धूल जैसे स्रोतों पर सख्ती से नियंत्रण जरूरी है। साथ ही, हरित क्षेत्र बढ़ाने, स्वच्छ ईंधन के उपयोग और जन-जागरूकता के जरिए ही राजधानी की हवा को कुछ हद तक सांस लेने लायक बनाया जा सकता है।
कुल मिलाकर, दिल्ली की हवा में मौजूद ये 19 हानिकारक तत्व न केवल पर्यावरण बल्कि आम लोगों की सेहत के लिए भी गंभीर खतरा बने हुए हैं। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में इसका असर और भी भयावह हो सकता है।