ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी बीमारी को केवल इसलिए गंभीर नहीं माना जा सकता कि वह स्थानांतरण नीति में सूचीबद्ध नहीं है। यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकल पीठ ने शिक्षक जैन सिंह लोधी की याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया।
याचिकाकर्ता जैन सिंह लोधी, दतिया जिले के पपरौन डेरा नायकखेड़ा में पदस्थ हैं। उन्हें 17 जून 2025 को डिरोलिपार स्थानांतरित कर दिया गया था। जैन सिंह लोधी लिवर सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं और उन्होंने अपने स्थानांतरण के खिलाफ आपत्ति दर्ज कराई थी।
जिला प्रशासन ने 24 नवंबर 2025 को उनकी आपत्ति खारिज कर दिया था, यह तर्क देते हुए कि लिवर सिरोसिस स्थानांतरण नीति में गंभीर बीमारियों की सूची में शामिल नहीं है। इस पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि नीति की धारा 24 में कैंसर, किडनी फेल्योर और ओपन हार्ट सर्जरी जैसी बीमारियों का उल्लेख केवल उदाहरण स्वरूप है, न कि यह गंभीर बीमारियों की संपूर्ण सूची है।

हाईकोर्ट ने कहा कि स्थानांतरण नीति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गंभीर बीमारी से पीड़ित कर्मचारी की वास्तविक स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया जाए। कोर्ट ने पाया कि प्राधिकरण ने याचिकाकर्ता की बीमारी की गंभीरता का मूल्यांकन किए बिना यांत्रिक तरीके से आदेश पारित किया, जो न्यायसंगत नहीं था।
न्यायालय ने इसके चलते आपत्ति खारिज करने वाला आदेश निरस्त कर दिया और निर्देश दिया कि 30 दिनों के भीतर कर्मचारी की बीमारी की गंभीरता का उचित मूल्यांकन करते हुए मामले पर पुनर्विचार किया जाए और नया निर्णय पारित किया जाए।
इस आदेश से स्पष्ट संदेश मिला है कि सरकारी स्थानांतरण नीतियों में स्वास्थ्य संबंधी मामलों में केवल सूचीबद्ध बीमारियों पर निर्भर रहना न्यायसंगत नहीं होगा। किसी कर्मचारी की गंभीर बीमारी का वास्तविक मूल्यांकन करना और उसके अनुसार निर्णय लेना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण precedent है जो गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के बावजूद स्थानांतरण के आदेश से प्रभावित होते हैं।