नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने चंदन नगर थाना प्रभारी इंद्रमणि पटेल के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से कार्य से हटाने के मौखिक निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि थाने में दर्ज प्रकरणों में अपने ही बनाए हुए गवाहों के बयान कराना और दर्जनों मामलों में एक ही गवाह को सबूत के तौर पर पेश करना आपराधिक न्याय प्रणाली की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
यह टिप्पणी मंगलवार, 13 जनवरी को एक आरोपी की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई। कोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर माना कि संबंधित अधिकारी ने बड़े पैमाने पर एक जैसे गवाहों का इस्तेमाल किया, जबकि मामलों की प्रकृति और घटनास्थल अलग-अलग थे। अदालत ने इसे सीधे तौर पर ‘बदमाशी’ करार दिया।
एक ही गवाह, दर्जनों–सैकड़ों मामले
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह तथ्य आया कि पुलिस द्वारा अदालत में पेश रिकॉर्ड में एक ही गवाहों के नाम दर्जनों और सैकड़ों मामलों में दोहराए गए हैं। कुछ गवाहों को अलग-अलग केसों में नियमित रूप से पेश किया गया, जो जांच की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

सरकार से सवाल—अब तक क्या कार्रवाई हुई?
कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि इस तरह के मामलों में अब तक क्या विभागीय कार्रवाई की गई है। साथ ही अगली सुनवाई में विस्तृत जवाब और पूरा रिकॉर्ड पेश करने के निर्देश दिए गए हैं।
वकील का दावा—कई थानों में ‘नियुक्त’ गवाह
अधिवक्ता मनोज बिनीवाले ने कहा कि यह समस्या केवल चंदन नगर तक सीमित नहीं है। शहर के कई थानों में गवाह बाकायदा नियुक्त हैं। कई बार जांच अधिकारी मौके पर जाकर जांच और स्वतंत्र गवाहों की सूची तैयार करने के बजाय अपने मुखबिर या एजेंट को तैयार कर अदालत में पेश कर देते हैं।
एएसपी के फर्जी हस्ताक्षर मामला
बर्खास्त एएसआई बहाल, लेकिन डिमोशन के साथ आरक्षक बनाया गया
पुलिस महकमे में एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक डॉ. संजीव उईके के फर्जी हस्ताक्षर करने के मामले में बर्खास्त किए गए बहरोल थाने की सेसई चौकी के पूर्व प्रभारी रामजी सिंह राजपूत को बहाल कर दिया गया है। हालांकि, उन्हें डिमोशन देकर एएसआई से आरक्षक बना दिया गया है।
मर्ग ड्राफ्ट में लापरवाही, एफएसएल भेजे फर्जी साइन से
जानकारी के अनुसार, चौकी प्रभारी रहते हुए रामजी सिंह से मर्ग ड्राफ्ट में लापरवाही हुई थी। इसे छिपाने के लिए उन्होंने एएसपी के फर्जी हस्ताक्षर कर दस्तावेज एफएसएल भेज दिए। संदेह होने पर मामला उजागर हुआ और विभागीय जांच के बाद उनकी सेवा समाप्त कर दी गई थी।
अपील पर राहत, लेकिन सजा बरकरार
अपील पर हिमानी खन्ना ने बहाली के आदेश दिए, लेकिन शर्त के साथ। आदेश के अनुसार, अगले दो साल तक रामजी सिंह को आरक्षक के पद पर ही ड्यूटी करनी होगी।
इन दोनों मामलों ने पुलिस तंत्र में जवाबदेही, पारदर्शिता और जांच की विश्वसनीयता को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद अब निगाहें राज्य सरकार और पुलिस विभाग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं।