भारत में नौकरी बाजार का नक्शा तेजी से बदल रहा है। अब रोजगार के नए अवसर सिर्फ मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि इंदौर, जयपुर, अहमदाबाद, कोच्चि, चंडीगढ़, लखनऊ और कोयंबटूर जैसे टियर-2 और टियर-3 शहरों में नौकरियों की तेज लहर देखने को मिल रही है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक छोटे शहरों में भर्ती की रफ्तार 20 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि मेट्रो शहरों में यह वृद्धि 14 प्रतिशत रही है।
लीडिंग जॉब्स एंड टैलेंट प्लेटफॉर्म फाउंडइट (Foundit) के अनुसार, साल 2025 में टियर-2 और 3 शहरों में करीब 1.28 करोड़ संभावित नौकरियां पैदा हो सकती हैं। यह संकेत देता है कि कंपनियां अब महानगरों से बाहर भी बड़े पैमाने पर निवेश और भर्ती कर रही हैं।
AI और स्टेबिलिटी ने बदली कंपनियों की रणनीति
अपग्रेड रिक्रूट (UpGrad Recruit) की रिपोर्ट के मुताबिक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल और कर्मचारियों की बेहतर स्थिरता (Retention) के चलते कंपनियां छोटे शहरों में ‘रीजनल कैपेबिलिटी कॉरिडोर’ विकसित कर रही हैं। अनुमान है कि 2027 तक AI एक्सपोजर वाले टेक रोल्स का हिस्सा 20 प्रतिशत से बढ़कर 32 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 79 प्रतिशत एचआर लीडर्स मानते हैं कि छोटे शहरों में कर्मचारियों की जॉब में टिके रहने की दर मेट्रो शहरों के बराबर या उससे भी बेहतर है। यही वजह है कि कंपनियां अब दीर्घकालिक रणनीति के तहत टियर-2 शहरों को प्राथमिकता दे रही हैं।

टेक हायरिंग में बढ़ेगा छोटे शहरों का दबदबा
वित्त वर्ष 2024 में टियर-2 और 3 शहरों की टेक हायरिंग में हिस्सेदारी 12 प्रतिशत थी, जो 2027 तक बढ़कर 19.7 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। कंपनियां इन शहरों में इंजीनियरिंग, टेक सपोर्ट, डेटा एनालिटिक्स, बैकएंड ऑपरेशंस और ऑटोमेशन से जुड़ी भूमिकाओं पर ज्यादा फोकस कर रही हैं।
अपग्रेड रिक्रूट के मुताबिक, टियर-2 और 3 शहरों से आने वाले प्लेसमेंट मैंडेट्स में 40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। बीते एक साल में यहां AI इंजीनियर्स, डेटा एनालिस्ट और ऑटोमेशन स्पेशलिस्ट की मांग करीब 40 प्रतिशत बढ़ी है, खासकर BFSI, IT सर्विसेज और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में।
अहमदाबाद की गिफ्ट सिटी, कोयंबटूर, कोच्चि, इंदौर और लखनऊ जैसे शहर अब AI से जुड़ी हायरिंग के लगभग 25 प्रतिशत मैंडेट्स का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
कम लागत और बड़ा टैलेंट पूल बना बड़ा कारण
कंपनियां मेट्रो शहरों की तुलना में कम लागत और व्यापक टैलेंट पूल के कारण छोटे शहरों में टैलेंट हब्स तैयार कर रही हैं। इंडस्ट्री अनुमान के अनुसार, टियर-2 शहरों में कुल ऑपरेशनल लागत (TCO) मेट्रो के मुकाबले 10 से 35 प्रतिशत तक कम है।
यही नहीं, बड़े शहरों में जहां कर्मचारी तेजी से नौकरी बदलते हैं, वहीं छोटे शहरों में कर्मचारी लंबे समय तक एक ही कंपनी में टिके रहते हैं, जिससे कंपनियों की ट्रेनिंग और हायरिंग लागत भी घटती है।
GCC और स्टार्टअप्स से बढ़ेगा रोजगार
राज्य सरकारों की नीतियों का भी इस बदलाव में बड़ा योगदान है। तमिलनाडु, कर्नाटक समेत कई राज्यों की नई इंडस्ट्रियल पॉलिसी के चलते बड़ी कंपनियां बेंगलुरु और चेन्नई के साथ-साथ छोटे शहरों में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) खोल रही हैं।
इंडस्ट्री अनुमान के मुताबिक, विदेशी कंपनियां 2030 तक भारत में GCC के जरिए 9.6 लाख करोड़ रुपए तक निवेश कर सकती हैं। फिलहाल भारत में 1,500 से अधिक GCC से करीब 13 लाख नौकरियां पैदा हो चुकी हैं और 2026 तक 500 से ज्यादा नए GCC जुड़ने की उम्मीद है।
विशाखापट्टनम, जयपुर, वडोदरा, कोच्चि और चंडीगढ़ जैसे शहरों में GCC पहले से ही सक्रिय हैं, जो फाइनेंस, HR, सप्लाई चेन, इंजीनियरिंग, R&D और डिजिटल क्लाउड सेवाएं दे रहे हैं।
महिलाओं और युवाओं के लिए बड़ा अवसर
यह बदलाव महिलाओं के लिए भी बेहद अहम माना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, 65 प्रतिशत महिला टेक प्रोफेशनल्स छोटे शहरों में, घर के पास काम करना पसंद करती हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 41 प्रतिशत है। इससे वर्क-लाइफ बैलेंस बेहतर होने और महिला वर्कफोर्स की भागीदारी बढ़ने की उम्मीद है।
फिनटेक, हेल्थ-टेक और AI-फर्स्ट स्टार्टअप्स में बढ़ती फंडिंग के चलते प्रोडक्ट, इंजीनियरिंग, ग्रोथ और रेवेन्यू रोल्स में भी नई भर्तियों की संभावना है। खास बात यह है कि भारत के कुल रजिस्टर्ड स्टार्टअप्स में से करीब 50 प्रतिशत टियर-2 और 3 शहरों से आते हैं।
26 शहर बन चुके हैं टेक्नोलॉजी हब
नैसकॉम और डेलॉय की इमर्जिंग टेक हब्स रिपोर्ट के मुताबिक, जयपुर, इंदौर, कोयंबटूर, अहमदाबाद समेत देश के 26 शहर अब टेक्नोलॉजी हब के रूप में उभर चुके हैं। भारत के करीब 60 प्रतिशत ग्रेजुएट्स छोटे शहरों से आते हैं, जो इन उभरते हब्स को मजबूत टैलेंट सपोर्ट प्रदान कर रहे हैं।
कुल मिलाकर, भारत का जॉब मार्केट अब मेट्रो-केंद्रित न रहकर विकेंद्रीकृत हो रहा है। छोटे शहरों में बढ़ती हाइटेक नौकरियां न सिर्फ रोजगार के नए अवसर पैदा कर रही हैं, बल्कि देश के संतुलित आर्थिक विकास की दिशा में भी अहम कदम साबित हो रही हैं।