समाज की संवेदनहीनता और गरीबी की यह तस्वीर हर किसी को झकझोर देने वाली है। जिस ठेले से एक बुजुर्ग रोज सब्जी बेचकर अपने परिवार का पेट पालते थे, उसी ठेले पर शनिवार को उन्हें अपनी बीमार पत्नी को लादकर अस्पताल की ओर भागना पड़ा। न एम्बुलेंस मिली, न किसी पड़ोसी ने मदद की, और न ही सिस्टम ने समय पर साथ दिया। नतीजा यह हुआ कि अस्पताल पहुंचने से पहले ही बुजुर्ग की पत्नी ने रास्ते में दम तोड़ दिया।
यह दर्दनाक घटना मध्य प्रदेश के सागर शहर की है। जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के सेसाई गांव निवासी पवन साहू पिछले करीब 12 साल से सागर में रहकर हाथ ठेले पर सब्जी बेचने का काम कर रहे हैं। इसी कमाई से वह अपने परिवार का गुजारा कर रहे थे। उनकी पत्नी लंबे समय से बीमार चल रही थीं, लेकिन गरीबी के कारण उनका समुचित इलाज नहीं हो पा रहा था। इलाज में जो थोड़ी-बहुत जमा पूंजी थी, वह पहले ही खत्म हो चुकी थी।

शनिवार को अचानक पत्नी की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई। हालत गंभीर देखकर पवन साहू घबरा गए। उन्होंने सबसे पहले पड़ोसियों से मदद मांगी। हाथ जोड़कर कहा कि कोई एम्बुलेंस बुला दे या अस्पताल तक पहुंचाने में मदद कर दे, लेकिन अफसोस कि किसी ने एक फोन तक करना जरूरी नहीं समझा। पवन अशिक्षित हैं और उन्हें यह भी नहीं पता था कि एम्बुलेंस सेवा के लिए कहां और कैसे फोन किया जाता है।
जब हर तरफ से निराशा हाथ लगी, तो मजबूर पति ने वही किया, जो उसके पास एकमात्र रास्ता था। उन्होंने अपनी पत्नी को उसी सब्जी वाले ठेले पर लिटाया, जिस पर रोज सब्जी रखकर वह शहर की गलियों में घूमते थे, और बदहवास हालत में अस्पताल की ओर निकल पड़े। वह पूरी ताकत लगाकर ठेला खींचते रहे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में माता मढ़िया के पास उनकी पत्नी की सांसें थम गईं। पत्नी को मृत हालत में देखकर पवन साहू वहीं टूट गए। आसपास के लोगों को जब इस घटना की जानकारी लगी, तो क्षेत्र में शोक और आक्रोश का माहौल बन गया।
घटना की सूचना मिलने पर पूर्व पार्षद नरेश यादव मौके पर पहुंचे। उन्होंने बुजुर्ग से पूरी घटना की जानकारी ली और तत्काल मदद का प्रयास किया। इसके बाद अपनत्व सेवा समिति के वाहन की व्यवस्था कर शव को नरयावली नाका स्थित मुक्तिधाम भिजवाया गया, जहां अंतिम संस्कार कराया गया।

यह घटना न सिर्फ एक गरीब परिवार की त्रासदी है, बल्कि समाज और व्यवस्था के चेहरे पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है। समय पर एम्बुलेंस, पड़ोसियों की संवेदनशीलता और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं मिल जातीं, तो शायद एक जान बचाई जा सकती थी। यह हादसा बताता है कि आज भी कई लोग ऐसे हैं, जिनके लिए इलाज और मदद तक पहुंचना एक सपना बना हुआ है।