गांधी केवल विचारक नहीं, कर्म के दार्शनिक भी थे: विजय बहादुर सिंह !

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भोपाल। महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर गांधी भवन में आयोजित व्याख्यान में ख्यात आलोचक और साहित्यकार विजय बहादुर सिंह ने कहा कि गांधी केवल विचारक या नेता नहीं थे, बल्कि कर्म के दार्शनिक थे। उनका दर्शन बोलने में नहीं, बल्कि करने में प्रकट होता है। गांधी को देवता की तरह पूजने के बजाय मनुष्य के रूप में देखना जरूरी है—ऐसा मनुष्य जो सवाल करता है, आत्ममंथन करता है और समय पर नैतिक हस्तक्षेप करता है।

कार्यक्रम का आयोजन गांधी भवन न्यास और ‘हम सब’ के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। विषय था – ‘गांधी के पुनर्पाठ की जरूरत’


‘गांधी को अनुभव से जाना’

विजय बहादुर सिंह ने कहा कि उन्होंने गांधी को किताबों में नहीं, बल्कि उनके निकट सहयोगियों और उनके साथ रहे लोगों के अनुभवों में जाना। बचपन की स्मृतियाँ साझा करते हुए उन्होंने बताया कि गांधी की हत्या के समय वे गांव में थे, जहां शिक्षा का अभाव था, लेकिन गांधी हर घर में मौजूद थे। शादियों, लोकगीतों और बातचीत में गांधी और नेहरू लोकनायकों की तरह उपस्थित रहते थे। यही अनुभव उन्हें गांधी की वास्तविक पहचान समझाने में मददगार साबित हुआ।


‘गांधी के उत्तर आत्मपरीक्षण के लिए विवश करते थे’

सिंह ने बताया कि 1969 में गांधी जन्मशती के अवसर पर उन्होंने गांधी का गंभीर अध्ययन शुरू किया। इस दौरान उनके निकट सहयोगियों कवि भवानी प्रसाद मिश्र और धर्मपाल सैनी से मुलाकात हुई, जिन्होंने गांधी की वैचारिक गहराई उनके सामने खोली।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सेवाग्राम आश्रम में स्वागत के लिए बिछाए गेहूँ को गांधी ने किसान के श्रम का अपमान बताया। उनके लिए अन्न, श्रम और मनुष्य तीनों समान पूजनीय थे


भारतीयता और कर्तव्य का संतुलन

विजय बहादुर सिंह ने गांधी की ‘भारतीयता’ पर भी प्रकाश डाला। उनके अनुसार, गांधी के लिए भारतीय होना केवल जन्म या भूगोल का प्रश्न नहीं, बल्कि अपनी परंपरा, समाज और लोगों पर आत्मविश्वास होना ही सच्ची भारतीयता थी। उन्होंने अधिकार और कर्तव्य के संतुलन पर जोर दिया और कहा कि समाज में आज जो अव्यवस्था है, उसका कारण यही असंतुलन है।

सिंह ने यह भी बताया कि गांधी के दृष्टिकोण में जीवन और कला अलग नहीं, पूजा, श्रम, नृत्य और जीवन सभी एक चेतना के रूप हैं। गांधी इस समग्र जीवन-दृष्टि के प्रतिनिधि थे।


अनुराधा शंकर सिंह: गांधी पूरी दुनिया की नैतिक चेतना

पूर्व आईजी और गांधी अध्येता अनुराधा शंकर सिंह ने कहा कि गांधी केवल भारत के स्वतंत्रता सेनानी नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की नैतिक चेतना बन चुके थे। अमेरिका की एक महिला ने रेडियो पर गांधी की हत्या की खबर सुनकर स्तब्धता महसूस की थी।

जॉर्ज ऑरवेल ने गांधी को ‘एक तीर्थ यात्रा पर चलता व्यक्ति’ बताया – विचार और कर्म की निरंतर नैतिक यात्रा।


आज गांधी को समझने की जरूरत

वक्ताओं ने कहा कि गांधी ने महिलाओं को उनके श्रम का पारिश्रमिक देकर निर्णय लेने की शक्ति दी। उन्होंने अधिकार और कर्तव्य का संतुलन सिखाया। उनका अहिंसात्मक संघर्ष न केवल भारत, बल्कि अन्य देशों के लिए भी प्रेरणास्त्रोत बना।

आज गांधी को केवल पढ़ने या याद करने की नहीं, उनके विचारों और कर्म-दर्शन को जीवन में उतारने की जरूरत है।


कार्यक्रम की रूपरेखा

  • सूत्रधार: राकेश दीवान
  • आभार प्रदर्शन: रघुराज सिंह
  • विशेष प्रदर्शनी: यंगशाला द्वारा संविधान पर पोस्टर प्रदर्शनी
  • उपस्थित: शहर के अनेक प्रबुद्धजन और युवा

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