देव दुर्लभ मानव जीवन ही सबसे बड़ा आनंद : महाराज !

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सागर। आनंद की अनुभूति बाहरी साधनों, भोग-विलास या परिस्थितियों से नहीं, बल्कि मनुष्य के अपने भाव, दृष्टिकोण और चेतना से होती है। देव दुर्लभ मानव शरीर, स्वस्थ इंद्रियां और भगवत चर्चा—यही जीवन का सबसे बड़ा आनंद है। यह उद्गार प्रेममूर्ति प्रेमभूषण महाराज ने रुद्राक्ष धाम में आयोजित 7 दिवसीय श्रीराम कथा के तीसरे दिन व्यक्त किए।

महाराज श्री ने आनंद, सुख, संस्कार और समर्पण का गूढ़ विवेचन करते हुए कहा कि आनंद कोई देने की वस्तु नहीं है, उसे प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं प्राप्त करना होता है। हमें कोई दूसरा आनंदित नहीं कर सकता। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि उसे देव दुर्लभ मानव शरीर मिला है और उसके सभी अंग स्वस्थ रूप से कार्य कर रहे हैं, तो इससे बड़ा आनंद इस संसार में कुछ भी नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा कि जहां भगवत चर्चा होती है, वहां केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्रकृति भी आनंदित हो जाती है और इसकी अनुभूति स्वतः होती है। यह आनंद सीमित नहीं है, इसलिए इसका कोई विलोम शब्द भी नहीं है।

आनंद का कोई विलोम नहीं

महाराज श्री ने कहा कि जीवन में उत्सव और प्रसन्नता के अनेक अवसर आते हैं, लेकिन वही व्यक्ति आनंद का अनुभव कर पाता है, जो हर परिस्थिति को उत्साह और स्वीकार भाव से जीता है। आनंद वह अवस्था है, जब जीव अपने शारीरिक और मानसिक बंधनों से ऊपर उठकर अति सुखद स्थिति का अनुभव करता है। एक ही परिस्थिति में कोई दुखी रहता है, तो कोई उसी में आनंद खोज लेता है। यह सब व्यक्ति के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।

राम की इच्छा से ही सब संभव

कथा के दौरान महाराज ने कहा कि इस संसार में वही होता है, जो प्रभु श्रीराम की इच्छा होती है। राम की इच्छा के बिना कुछ भी संभव नहीं है, लेकिन सीमित बुद्धि वाला मनुष्य यह मान लेता है कि सब कुछ उसी ने किया है। यही “मैं” का भाव माया है। जैसे भी प्रभु का साक्षात्कार हो जाए, वे जीव को सद्गति प्रदान करते हैं। राक्षसी ताड़का को भी प्रभु श्रीराम ने सद्गति ही दी।

संस्कार अभ्यास से जीवन में उतरते हैं

महाराज श्री ने विद्यार्थियों और अभिभावकों को संबोधित करते हुए कहा कि संस्कारों की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन संस्कार निरंतर अभ्यास से जीवन में उतरते हैं। उठने-बैठने, खाने-पीने और व्यवहार में संस्कार झलकने चाहिए। केवल लिखने-पढ़ने से नहीं, बल्कि संस्कारमय जीवन जीने से ही पुण्य और सौभाग्य की वृद्धि होती है। यही सनातन संस्कृति की आत्मा है।

गुरु के प्रति समर्पण का महत्व

रामचरितमानस का उदाहरण देते हुए महाराज ने कहा कि जो अपने श्रेष्ठ या सद्गुरु की अवहेलना करते हैं, उन्हें अंततः उसका परिणाम भुगतना पड़ता है। उन्होंने रामजी और महर्षि विश्वामित्र के धनुष यज्ञ प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि जब विश्वामित्र जी ने राम से पूछा कि धनुष यज्ञ में चलना है क्या, तो रामजी ने उत्तर देने के बजाय तुरंत मिथिला जाने की तैयारी कर ली। यही समर्पण आगे चलकर श्री सीताराम विवाह का कारण बना।

सुमधुर गायन से भावविभोर हुए श्रद्धालु

रामकथा के दौरान महाराज श्री ने धनुषभंग और श्री सीता-राम विवाह प्रसंगों का सुमधुर गायन किया। उनके भजनों पर बड़ी संख्या में उपस्थित रामकथा प्रेमी भावविभोर होकर झूमते नजर आए।

आयोजन में गणमान्य जन रहे उपस्थित

कथा आयोजन के मुख्य यजमान पूर्व मंत्री भूपेन्द्र सिंह ने सपरिवार व्यासपीठ पूजन कर आरती उतारी। इस अवसर पर पूर्व पर्यटन विकास निगम अध्यक्ष विनोद गोटिया, आरएसएस प्रांत पदाधिकारी सुनील देव, रानी अवंती बाई लोधी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. विनोद मिश्रा, भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष रणवीर सिंह रावत, जिला भाजपा अध्यक्ष श्याम तिवारी, पूर्व मंत्री प्रभुसिंह, नगर निगम परिषद अध्यक्ष वृंदावन अहिरवार, एसडीएम मनोज चौरसिया सहित बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, संतगण, सामाजिक कार्यकर्ता और श्रद्धालु उपस्थित रहे।

बच्चों के साथ समय बिताना सौभाग्य

महाराज श्री ने कहा कि जिनके घर में बच्चे हैं, उनके पास आनंद प्राप्त करने का एक विशेष साधन है। बच्चों के साथ समय बिताने वाले माता-पिता वास्तव में सौभाग्यशाली होते हैं, क्योंकि समय आने पर वही बच्चे पढ़ाई या जीवन के कारण दूर चले जाते हैं और तब यह एहसास होता है कि बच्चों के साथ बिताया गया हर क्षण कितना अनमोल था।

उन्होंने स्पष्ट किया कि सुख मन की स्थिति है और आनंद हृदय की। ये दोनों किसी और से नहीं मिलते, इन्हें स्वयं प्राप्त करना होता है। विषयी व्यक्ति को विषयों में आनंद मिलता है, जबकि भजनानंदी को भजन में। हमें स्वयं तय करना होता है कि हमें कैसा सुख और कैसा आनंद चाहिए। आनंद मजा नहीं है, क्योंकि मजा की सजा होती है, लेकिन आनंद का कोई विपरीत शब्द नहीं होता। यह सात्विक प्रक्रिया से प्राप्त होने वाली अवस्था है।

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