इंदौर: मध्य प्रदेश की चर्चित ‘मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना’ को लेकर इंदौर हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने योजना में नए पंजीकरण शुरू करने, राशि बढ़ाकर 3000 रुपए करने और आयु सीमा में बदलाव की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को सिरे से खारिज कर दिया।
कोर्ट का तर्क
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि योजना कब शुरू करनी है और कब बंद, यह राज्य सरकार का नीतिगत फैसला है। न्यायालय तब तक इसमें दखल नहीं दे सकता जब तक कि यह पूरी तरह असंवैधानिक न हो।
कोर्ट ने कहा, “हम सरकार की बुद्धिमत्ता की जांच नहीं करते। योजना की तारीखें तय करना राज्य का अधिकार क्षेत्र है। इसे ‘शत्रुतापूर्ण भेदभाव’ नहीं माना जा सकता।” न्यायालय ने पाया कि 21 से 60 वर्ष की आयु सीमा और पंजीकरण की समय-सीमा तय करने में कुछ भी असंवैधानिक नहीं है।

PIL दायर करने वाले और उनकी दलील
पूर्व विधायक पारस सकलेचा ने वरिष्ठ अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल के माध्यम से कोर्ट में दलील दी थी कि योजना 20 अगस्त 2023 से बंद है। उन्होंने तर्क दिया कि जिन महिलाओं की उम्र इस तारीख के बाद 21 वर्ष हुई, उन्हें पोर्टल बंद होने के कारण लाभ नहीं मिल पा रहा है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।
सकलेचा ने यह भी मांग की थी कि लाभार्थियों को 3000 रुपए प्रति माह दिए जाएं और आयु सीमा हटाकर जीवनभर लाभ सुनिश्चित किया जाए।
सरकार का पक्ष
अतिरिक्त महाधिवक्ता संदीप भार्गव ने कोर्ट में तर्क दिया कि यह एक कार्यकारी नीति है और इसमें कोई मनमानी नहीं है। कोर्ट ने सरकार के तर्कों से सहमति जताई और आदेश में कहा कि यह नीति की वैधता का मामला है, न कि उसकी बुद्धिमत्ता का।

आगे की लड़ाई
PIL खारिज होने के बाद पारस सकलेचा ने कहा कि वे इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।
फैसले के मायने
प्रदेश की लाखों लड़कियों को जिन्हें हाल ही में 21 वर्ष की उम्र पूरी हुई है, उन्हें अब अधिक इंतजार करना होगा। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि कितनी राशि दी जाएगी, यह सरकार अपने खजाने और नीति के अनुसार तय करेगी। कोर्ट ने इसे सतत योजना मानने से इनकार किया और इसे सरकार की विशिष्ट कार्यकारी योजना बताया।