खुरई, सुरखी और नरयावली विधानसभा क्षेत्रों की सीमा पर विंध्यगिरी पर्वतमाला की लगभग 650 मीटर ऊंची चोटी पर स्थित एक प्राचीन धार्मिक स्थल है। बीते करीब 20 वर्षों में यह स्थान आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया है। धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ यह स्थल इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वालों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है।
चरवाहों को मिला था खंडित शिवलिंग
लखेरा धाम से जुड़े कोई लिखित ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार लगभग 20 साल पहले गाय चराते समय चरवाहों को यहां एक खंडित शिवलिंग मिला था। इसके बाद धीरे-धीरे यह स्थान लोगों की आस्था का केंद्र बन गया।
धाम के महंत बाबा रामदास बताते हैं कि वर्षों पहले खजाने की तलाश में कई लोगों ने इस पहाड़ी पर खुदाई की थी। संभव है कि उसी दौरान जमीन में दबा शिवलिंग खंडित हो गया हो। बाद में यह शिवलिंग चरवाहों को दिखाई दिया और इसके साथ ही इस स्थान की महत्ता सामने आई।

ग्रामीणों के सहयोग से खंडित शिवलिंग के दोनों हिस्सों को चबूतरा बनाकर स्थापित किया गया है। साथ ही एक नए शिवलिंग की भी स्थापना की गई है।
डकैतों का ठिकाना रहा इलाका
70 वर्षीय ग्रामीण अमर सिंह पटेल के अनुसार, उनके पूर्वज इस शिवलिंग को काफी प्राचीन मानते थे। क्षेत्र की सबसे ऊंची चोटी होने के कारण यह इलाका एक समय डकैतों का ठिकाना भी रहा। स्थानीय मान्यता है कि डकैत भी यहां भगवान भोलेनाथ की पूजा करते थे।

प्राचीन गुफा और नई योजना
तोड़ा काछी निवासी बुजुर्ग जयराम रजक के मुताबिक, इस पर्वत पर एक प्राचीन प्राकृतिक गुफा भी है, जिसका प्रवेश द्वार किसी खतरे के डर से वर्षों पहले बंद कर दिया गया था। इसकी लंबाई और विस्तार के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है।
अब मंदिर परिसर में एक कृत्रिम गुफा बनाने का कार्य चल रहा है, जहां विशाल शिवलिंग के साथ शिव परिवार और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी।

शिवलिंग के आकार की पहाड़ी
लखेरा धाम की पहाड़ी नीचे मैदानी क्षेत्र से देखने पर विशाल शिवलिंग के आकार की प्रतीत होती है। संसाधनों की कमी के कारण जो लोग धाम तक नहीं पहुंच पाते, वे दूर से ही इस पहाड़ी को नमन कर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।
संसाधनों की कमी, फिर भी उमड़ती है आस्था
यहां तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क या परिवहन सुविधा उपलब्ध नहीं है। श्रद्धालु तोड़ा काछी गांव से करीब चार किलोमीटर का कच्चा और पहाड़ी रास्ता पैदल तय कर धाम पहुंचते हैं। कठिन रास्ते के बावजूद महाशिवरात्रि, बसंत पंचमी, नागपंचमी, सावन, नवरात्रि और हरितालिका तीज जैसे पर्वों पर यहां बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं।

स्थानीय ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि लखेरा धाम और आगे स्थित ज्वाला देवी धाम तक पहुंच मार्ग की मांग कई बार प्रशासन से की जा चुकी है, लेकिन अब तक इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
लखेरा बाबा की लोककथा
लखेरा धाम से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा पास के ज्वाला देवी मंदिर से संबंधित है। मान्यता है कि वर्षों पहले क्षेत्र में भीषण सूखा पड़ा। तब ग्रामीण मां ज्वाला देवी से प्रार्थना करने पहुंचे। देवी ने भक्तों से कहा कि सामने की पहाड़ी पर उनके भाई लखेरा बाबा का निवास है और उनसे प्रार्थना करने पर समस्या का समाधान होगा। लोगों ने भजन-कीर्तन किया और इसके बाद क्षेत्र में वर्षा हुई।

कैसे पहुंचे लखेरा धाम
- खुरई से मार्ग: राहतगढ़ मार्ग से ग्राम कठैली होते हुए लगभग 18 किलोमीटर में तोड़ा काछी ग्राम पंचायत पहुंचा जा सकता है। यहां से चार किलोमीटर का पहाड़ी रास्ता पैदल तय करना होता है।
- बरौदिया नोनागिर मार्ग: राहतगढ़-खुरई मार्ग से मुड़कर करीब 22 किलोमीटर बाद तोड़ा काछी पहुंचते हैं, फिर चार किलोमीटर पैदल यात्रा।
- सागर से मार्ग: सागर से जरूआखेड़ा होते हुए जलंधर पहुंचकर पहाड़ी रास्ते से धाम तक पहुंचा जा सकता है। कुल दूरी लगभग 50 किलोमीटर है।
आस्था, इतिहास और प्रकृति का संगम
लखेरा धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि लोकविश्वास, प्राकृतिक सौंदर्य और क्षेत्रीय इतिहास का संगम है। संसाधनों की कमी के बावजूद यहां श्रद्धालुओं की आस्था अडिग है। स्थानीय लोग उम्मीद करते हैं कि भविष्य में यहां बुनियादी सुविधाएं विकसित होंगी, जिससे यह स्थल धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सके।