सागर। जिले के बहेरिया थाना क्षेत्र में फर्जी अंकसूची लगाकर पुलिस विभाग में आरक्षक की नौकरी हासिल करने के मामले में अदालत ने अहम फैसला सुनाया है। प्रकरण की सुनवाई पंचम अपर सत्र न्यायाधीश सुधांशु सक्सेना की अदालत में हुई। न्यायालय ने मुख्य आरोपी आशीष सूर्यवंशी को दोषी पाते हुए 5 वर्ष के सश्रम कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई है।
वहीं, मामले में नामजद दो अन्य आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया।
📌 2016 में हुआ था चयन
अभियोजन के अनुसार, आशीष सूर्यवंशी का वर्ष 2016 में पुलिस विभाग में आरक्षक पद पर चयन हुआ था। चयन के बाद उसकी पहली पदस्थापना पचमढ़ी में की गई थी। पोस्टिंग को लेकर वह हाईकोर्ट भी गया था। बाद में विभाग ने उसकी पदस्थापना संशोधित कर इंदौर कर दी।
🔎 तबादले के दौरान खुला फर्जीवाड़ा
इंदौर तबादले के बाद विभागीय प्रक्रिया के तहत उसके शैक्षणिक दस्तावेजों की जांच की गई। जांच में सामने आया कि कक्षा 10वीं की जो अंकसूची उसने भर्ती के समय प्रस्तुत की थी, वह फर्जी थी।
फर्जीवाड़े की पुष्टि होने पर पुलिस विभाग ने बहेरिया थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने अपराध पंजीबद्ध कर विस्तृत जांच शुरू की और आवश्यक दस्तावेज व साक्ष्य एकत्र किए। जांच पूर्ण होने के बाद चालान न्यायालय में पेश किया गया।
📂 कोर्ट में पेश हुए अहम साक्ष्य

सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने फर्जी अंकसूची सहित अन्य दस्तावेज और साक्ष्य अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए।
मामले की पैरवी कर रहे अपर लोक अभियोजक रमन कुमार जारोलिया ने न्यायालय को बताया कि वर्ष 2009 में आरोपी ने अपने दो सहयोगियों के साथ मिलकर फर्जी अंकसूची तैयार करवाई थी। इसी दस्तावेज का उपयोग उसने वर्ष 2016 की पुलिस भर्ती प्रक्रिया में किया।
सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने आशीष सूर्यवंशी को दोषी ठहराया और 5 वर्ष के सश्रम कारावास के साथ जुर्माने की सजा सुनाई।
⚠️ कोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि शासकीय सेवा में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्रवेश करना गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में कठोर दंड आवश्यक है, ताकि भविष्य में इस प्रकार की धोखाधड़ी पर अंकुश लगाया जा सके।
🏛️ महत्वपूर्ण बिंदु
- 2016 में आरक्षक पद पर हुआ था चयन
- 10वीं की फर्जी अंकसूची के आधार पर मिली नौकरी
- इंदौर तबादले के दौरान दस्तावेज जांच में खुलासा
- 5 वर्ष का सश्रम कारावास और जुर्माना
- दो अन्य आरोपी साक्ष्यों के अभाव में बरी
इस फैसले को सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और सत्यापन की सख्ती के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है