भारत–अमेरिका व्यापार समझौता देश को नई आर्थिक और रणनीतिक ऊंचाई देगा: भूपेन्द्र सिंह !

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सागर। पूर्व गृह मंत्री एवं वरिष्ठ विधायक भूपेन्द्र सिंह ने भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच हुए नए व्यापार समझौते को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह केवल निर्यात वृद्धि का करार नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक क्षमता को नई दिशा देने वाला व्यापक ढांचा है। उन्होंने कहा कि यह समझौता रोजगार सृजन, रक्षा उत्पादन, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की मजबूत भागीदारी और तकनीकी आत्मनिर्भरता को गति देगा।

टैरिफ में राहत से निर्यातकों को बड़ा लाभ

श्री सिंह ने कहा कि अब तक भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक दंडात्मक टैरिफ लगाए जाने की आशंका से निर्यातकों में अस्थिरता थी। नए समझौते के तहत कई उत्पादों पर शुल्क घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है, जबकि कई प्रमुख वस्तुओं को अमेरिकी बाजार में शून्य शुल्क पर प्रवेश देने का प्रावधान किया गया है। इससे भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिलेगी और अमेरिका जैसे विशाल बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने का अवसर मिलेगा।

उन्होंने बताया कि भारत का अमेरिका को वार्षिक निर्यात लगभग 90 अरब डॉलर है, जिसमें करीब 30 अरब डॉलर श्रम-प्रधान क्षेत्रों से आता है। यदि उच्च टैरिफ लागू होते, तो लाखों रोजगार प्रभावित हो सकते थे। यह समझौता उस अनिश्चितता को समाप्त करता है और उद्योगों को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करता है।

एमएसएमई और श्रम-प्रधान क्षेत्रों को मजबूती

टेक्सटाइल, लेदर, जेम्स एवं ज्वैलरी, इंजीनियरिंग उत्पाद, केमिकल्स, खिलौने, फुटवियर, होम डेकोर और प्रोसेस्ड फूड जैसे क्षेत्रों को विशेष लाभ मिलने की संभावना है। इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) कार्यरत हैं। शुल्क में कमी से उनकी लागत घटेगी, प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी और ग्रामीण व अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार सृजन को बल मिलेगा। अनुमान है कि इस समझौते से लगभग 20 लाख नए रोजगार उत्पन्न हो सकते हैं।

कृषि और किसानों को लाभ

मसाले, चाय, कॉफी, चावल, फल, समुद्री उत्पाद सहित कई कृषि उत्पादों को बिना अतिरिक्त शुल्क अमेरिकी बाजार में पहुंचने का अवसर मिलेगा। इससे निर्यात से जुड़े किसानों को सीधा लाभ होगा और वे वैश्विक वैल्यू चेन से जुड़ सकेंगे। भारत का कृषि व्यापार पहले से सरप्लस में है, जिसमें और वृद्धि की संभावना जताई जा रही है।

तकनीकी सहयोग और ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा

श्री सिंह ने कहा कि समझौते के तहत भारत को जीपीयू, सेमीकंडक्टर वेफर्स और जेट इंजन जैसी उन्नत तकनीकों तक बेहतर पहुंच मिलेगी। अमेरिकी कंपनियों द्वारा भारत में सेमीकंडक्टर असेंबली एवं टेस्टिंग केंद्र स्थापित करने की घोषणा से इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को गति मिलेगी और आयात पर निर्भरता कम होगी। यह ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियानों को नई ऊर्जा देगा।

रक्षा क्षेत्र में रणनीतिक मजबूती

जेट इंजन तकनीक और प्रीडेटर ड्रोन जैसे उपकरणों के भारत में निर्माण का मार्ग प्रशस्त होना देश की रक्षा क्षमता को सुदृढ़ करेगा। इससे रक्षा निर्यात बढ़ेगा और भारत आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की दिशा में मजबूत कदम रख सकेगा।

जीडीपी और एफडीआई पर सकारात्मक प्रभाव

विशेषज्ञों के अनुसार, इस समझौते से भारत के जीडीपी में 0.2 से 0.3 प्रतिशत तक अतिरिक्त वृद्धि संभव है, जबकि कुछ आकलन इसे लगभग 1 प्रतिशत तक सकारात्मक प्रभाव वाला मानते हैं। शीर्ष 15 उत्पादों का निर्यात 97 से 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है और टैरिफ में कमी से करीब 25 हजार करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचत का अनुमान है। साथ ही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में 20 प्रतिशत तक वृद्धि की संभावना जताई गई है।

फार्मा और डिजिटल संप्रभुता सुरक्षित

उन्होंने कहा कि भारतीय जेनेरिक दवाओं को अमेरिकी बाजार में अधिक सुगम प्रवेश मिलने की संभावना है, जिससे फार्मा निर्यात और अनुसंधान सहयोग बढ़ेगा। साथ ही डेटा लोकलाइजेशन नियमों को यथावत रखा गया है और कृषि व डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को समझौते से बाहर रखा गया है, ताकि घरेलू हित सुरक्षित रहें।

अंत में श्री सिंह ने विश्वास जताया कि प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं के बाद समझौता शीघ्र अंतिम रूप लेगा और आने वाले वर्षों में भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में एक सशक्त एवं विश्वसनीय साझेदार के रूप में स्थापित करेगा।

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