बाघों के आशियाने पर संकट: पन्ना टाइगर रिजर्व के ईको-सेंसिटिव जोन में खदान को मंजूरी, वन्यजीवों पर खतरे की आशंका |

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छतरपुर/पन्ना।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। पन्ना-छतरपुर जिले में स्थित पन्ना टाइगर रिजर्व (PTR) के ईको-सेंसिटिव जोन में 20 हेक्टेयर क्षेत्र में पत्थर खदान की लीज स्वीकृत किए जाने से वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरण विशेषज्ञों में चिंता गहरा गई है। यह लीज राजनगर तहसील के बरद्वाहा गांव में दी गई है, जहां केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत ढोड़न बांध का निर्माण कार्य चल रहा है।

यह खदान नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी (एनसीसी) को आवंटित की गई है। विवाद इस बात को लेकर है कि जिस क्षेत्र में खनन की अनुमति दी गई है, वह पन्ना टाइगर रिजर्व के ईको-सेंसिटिव जोन में आता है—ऐसा इलाका जहां किसी भी औद्योगिक गतिविधि से पहले नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ की स्थाई समिति से अनुमति अनिवार्य होती है।

क्रेशर प्लांट पहले, अनुमति बाद में?

चौंकाने वाली जानकारी यह सामने आई है कि आवश्यक अनुमति की औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही मौके पर क्रेशर प्लांट स्थापित कर दिया गया। राजस्व भूमि के खसरा नंबर 1361/1 पर स्वीकृत यह खदान रनगुवां बांध के डूब क्षेत्र के किनारे स्थित है।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, प्लांट से महज 800 मीटर की दूरी पर टाइगर रिजर्व की चंद्रनगर रेंज (बरद्वाहा बीट) शुरू हो जाती है, जो आगे कोर एरिया की सीलोन और सेजा बीट से जुड़ती है। यही वह क्षेत्र है जहां बाघों का नियमित मूवमेंट रहता है।

बाघों के मूवमेंट पर असर की आशंका

वन विभाग से जुड़े जानकारों का कहना है कि इस इलाके में दो बाघिनों सहित कम से कम पांच बाघों का स्थायी मूवमेंट है। यह क्षेत्र प्राकृतिक गलियारे (कॉरिडोर) के रूप में भी महत्वपूर्ण है, जहां से वन्यजीव एक हिस्से से दूसरे हिस्से में आवाजाही करते हैं।

भारी मशीनों का शोर, ब्लास्टिंग और खनन से निकलने वाली धूल इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बाघों का प्राकृतिक आवास अशांत हुआ, तो वे अपना इलाका बदलने को मजबूर हो सकते हैं, जिससे आपसी संघर्ष और मौतों की आशंका बढ़ जाएगी।

विशेषज्ञ की चेतावनी

पन्ना टाइगर रिजर्व के पूर्व फील्ड डायरेक्टर केएस भदौरिया ने कहा कि केन-बेतवा परियोजना के तहत पहले से चल रही गतिविधियों ने चंद्रनगर रेंज के ईको-सिस्टम को प्रभावित किया है। उन्होंने आशंका जताई कि यदि खनन और क्रेशर संचालन शुरू हुआ तो बाघों का घनत्व असंतुलित हो सकता है।

उनके अनुसार, जब बाघ अपना इलाका छोड़ते हैं, तो वे दूसरे बाघों के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। इससे क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ता है और कई बार खूनी झड़पों में बाघों की जान भी चली जाती है।

वन विभाग ने मांगी रिपोर्ट

मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए मध्यप्रदेश के चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन शुभरंजन सेन ने कहा कि ईको-सेंसिटिव जोन में क्रेशर प्लांट स्थापित होने का मामला अभी उनके संज्ञान में नहीं आया है। उन्होंने कहा कि टाइगर रिजर्व प्रबंधन से रिपोर्ट मांगी जाएगी और तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

कंपनी का पक्ष

दूसरी ओर, एनसीसी कंपनी के प्रबंधन प्रतिनिधि शैलेंद्र सिंह का कहना है कि कंपनी सभी नियमों के तहत कार्य कर रही है। उनके अनुसार, प्लांट स्थापित करने के लिए आवश्यक अनुमति ली गई है और अभी मौके पर खनन शुरू नहीं किया गया है।

हालांकि पर्यावरण कार्यकर्ताओं का सवाल है कि यदि अंतिम स्वीकृतियां लंबित हैं, तो भारी मशीनों और प्लांट की स्थापना कैसे कर दी गई?

विकास बनाम संरक्षण की बहस

पन्ना टाइगर रिजर्व देश के प्रमुख बाघ अभयारण्यों में से एक है। एक समय यहां बाघों की संख्या शून्य हो गई थी, लेकिन पुनर्वास और संरक्षण प्रयासों से यह क्षेत्र फिर से बाघों से आबाद हुआ। ऐसे में ईको-सेंसिटिव जोन में औद्योगिक गतिविधि को मंजूरी मिलना संरक्षण प्रयासों पर सवाल खड़े करता है।

केन-बेतवा लिंक परियोजना को जहां विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया जा रहा है, वहीं पर्यावरणविदों का तर्क है कि किसी भी विकास कार्य में पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी दीर्घकालिक नुकसान का कारण बन सकती है।

आगे क्या?

अब नजर इस बात पर है कि वन विभाग और नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं। यदि नियमों का उल्लंघन पाया गया, तो कार्रवाई संभव है।

फिलहाल, बाघों के आशियाने पर मंडराते इस संकट ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि विकास की दौड़ में कहीं हम अपनी प्राकृतिक धरोहर को तो दांव पर नहीं लगा रहे। जंगलों की खामोशी में गूंजती मशीनों की आवाज आने वाले समय की बड़ी चेतावनी हो सकती है।

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