जिले में कृषि और उद्यानिकी के क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उद्यानिकी तथा खाद्य प्रसंस्करण विभाग द्वारा जिला पंचायत सभागार में एकीकृत बागवानी मिशन अंतर्गत दो दिवसीय कार्यशाला एवं सेमिनार का सफल आयोजन किया गया। 24 और 25 मार्च 2026 को आयोजित इस कार्यशाला में उद्यानिकी फसलों की नवीन तकनीकों, फ्रूट फॉरेस्ट्री, हाइड्रोपोनिक्स तथा खाद्य प्रसंस्करण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। कलेक्टर के निर्देशानुसार आयोजित इस कार्यक्रम में 250 से अधिक किसान, उद्यमी एवं महिला कृषकों ने भाग लेकर आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी प्राप्त की।

कार्यशाला का शुभारंभ 24 मार्च को पारंपरिक विधि से मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ किया गया। उद्घाटन सत्र में उपस्थित विशेषज्ञों और अधिकारियों ने किसानों को आधुनिक तकनीकों से जुड़ने तथा कृषि को लाभकारी व्यवसाय के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया।
कार्यशाला के प्रथम दिवस में वरिष्ठ वैज्ञानिक कृषि अधिकारी आशीष त्रिपाठी ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि खेती को लाभकारी बनाने के लिए सूक्ष्म तकनीकों का उपयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि आज के समय में केवल पारंपरिक खेती पर्याप्त नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर फसलों के संरक्षण और उत्पादन में वृद्धि करना जरूरी है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे नई तकनीकों के साथ-साथ कृषि जागरूकता को भी बढ़ाएं।

युवा जैविक कृषक आकाश चौरसिया ने बुंदेलखंड क्षेत्र में जल संकट की समस्या को रेखांकित करते हुए कहा कि जल प्रबंधन के बिना कृषि का विकास संभव नहीं है। उन्होंने “खेत का पानी खेत में” की अवधारणा पर जोर देते हुए जल संरक्षण को प्राथमिकता देने की बात कही। उन्होंने मल्टी लेयर खेती को एक प्रभावी तकनीक बताते हुए कहा कि इससे सीमित भूमि पर भी विभिन्न प्रकार की फसलें उगाकर उत्पादन और आय दोनों बढ़ाई जा सकती हैं। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अनुपयोगी फसलों को नष्ट करने के बजाय उनके उपयोग के नए तरीके खोजे जाएं।
कार्यक्रम में उपसंचालक उद्यान पी.एस. बडोले ने किसानों को मौसम के अनुसार फसलों की योजना बनाने की सलाह दी। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि यदि दिसंबर-जनवरी में नींबू के बीज लगाए जाएं और उचित देखभाल की जाए, तो अप्रैल में अधिक मांग और बेहतर मूल्य प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने टमाटर उत्पादन को भी एक बड़ा अवसर बताते हुए कहा कि सागर जिला इस क्षेत्र में विशेष पहचान बना सकता है।
द्वितीय दिवस, 25 मार्च को आयोजित सत्रों में विशेषज्ञों ने जैविक खेती, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित उद्यमिता पर विस्तृत जानकारी दी। कृषि विज्ञान केंद्र सागर के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. के.एस. यादव ने कहा कि जैविक खेती आज केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण की दृष्टि से आवश्यकता बन चुकी है। उन्होंने “जैविक भारत” अभियान का उल्लेख करते हुए बताया कि इससे देश में जैविक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है।
उन्होंने पारंपरिक खेती पद्धतियों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि प्राकृतिक तरीकों से फलदार पौधों का संरक्षण और पोषण संभव है। उन्होंने कहा कि यह पद्धति श्रम आधारित जरूर है, लेकिन इससे लागत कम होती है और उत्पाद की गुणवत्ता बेहतर होती है।
कृषि महाविद्यालय रहली की डीन डॉ. रश्मि पांडे ने खाद्य प्रसंस्करण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्तमान समय में यह क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहा है। उन्होंने बताया कि वैश्विक स्तर पर लोग अब स्वास्थ्य और पोषण के प्रति अधिक जागरूक हो रहे हैं, जिससे प्राकृतिक और प्रसंस्कृत उत्पादों की मांग बढ़ रही है।
उन्होंने मोरिंगा (सहजन) पाउडर, प्याज पाउडर, टमाटर केचप जैसे उत्पादों का उदाहरण देते हुए कहा कि इनका बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि सागर जिला “एक जिला एक उत्पाद” योजना के अंतर्गत टमाटर उत्पादन से जुड़ा हुआ है, जिससे किसानों के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं।
खाद्य प्रसंस्करण विशेषज्ञ डॉ. मयंक मेहरा ने किसानों को उद्यमिता की ओर प्रेरित करते हुए कहा कि वे खाद्य प्रसंस्करण को रोजगार का साधन बना सकते हैं। उन्होंने मार्केटिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग के महत्व को समझाते हुए कहा कि केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि उत्पाद की प्रस्तुति भी सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
उन्होंने प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इसके माध्यम से किसान और उद्यमी आसानी से ऋण प्राप्त कर सकते हैं और छोटे स्तर पर उद्योग शुरू कर सकते हैं। उन्होंने चिप्स, मसाले, आटा, दाल और केचप जैसे उत्पादों के निर्माण को लाभकारी व्यवसाय बताया।
जिला समन्वयक जन अभियान परिषद के.के. मिश्रा ने ग्रामीण विकास में सामुदायिक सहभागिता के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण, ऊर्जा संसाधनों का सही उपयोग और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।
कार्यशाला के समापन सत्र में उपसंचालक उद्यान पी.एस. बडोले ने पुनः किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर आय के नए स्रोत विकसित किए जा सकते हैं। उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि वे प्रशिक्षण, अभ्यास और डिजिटल तकनीकों का उपयोग कर अपने ज्ञान और आय दोनों को बढ़ाएं।
कार्यक्रम का संचालन सुव्यवस्थित तरीके से किया गया और अंत में वरिष्ठ उद्यान विकास अधिकारी अशोक कुमार मलारिया ने आभार व्यक्त किया। उन्होंने सभी अतिथियों, विशेषज्ञों और प्रतिभागियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होती हैं।
कार्यक्रम में अश्विनी मोनडे, अशोक मलारया, राम कुमार यादव, प्रदीप परिहार, हर्षदीप यादव, अमृता बड़कुल, मेघा व्यास, रिया द्विवेदी, सुरभि शर्मा, शैलजा ढोके सहित बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने सहभागिता की।
इसके अतिरिक्त ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़े अनूप तिवारी और ऋतु सेन भी उपस्थित रहे। कार्यशाला में लगभग 250 से अधिक किसान, महिला कृषक और उद्यमियों ने भाग लेकर आधुनिक कृषि तकनीकों और उद्यमिता के नए आयामों को समझा।
यह कार्यशाला न केवल तकनीकी ज्ञान प्रदान करने का माध्यम बनी, बल्कि किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और कृषि को एक लाभकारी व्यवसाय के रूप में विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल भी साबित हुई। विशेषज्ञों के मार्गदर्शन और सरकारी योजनाओं की जानकारी ने प्रतिभागियों को नई सोच और दिशा प्रदान की।
कुल मिलाकर, सागर में आयोजित यह दो दिवसीय कार्यशाला कृषि और उद्यानिकी क्षेत्र में नवाचार, तकनीकी उन्नति और उद्यमिता को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रही, जिससे आने वाले समय में किसानों की आय में वृद्धि और क्षेत्रीय विकास को नई गति मिलने की उम्मीद है।