गुना के दलवी कॉलोनी स्थित एक निजी स्कूल पर गंभीर आरोप लगे हैं, जहां एक 6 वर्षीय डायबिटीज पीड़ित बच्ची को उसकी बड़ी बहन समेत स्कूल से निकाल दिया गया। इस घटना ने शिक्षा के अधिकार, बच्चों के स्वास्थ्य और मानवीय संवेदनाओं को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पीड़ित परिवार ने इस मामले में पुलिस और प्रशासन से कार्रवाई की मांग की है।
मामला क्या है
भगत सिंह कॉलोनी निवासी दिलीप थापर ने आरोप लगाया कि उनकी छोटी बेटी (काल्पनिक नाम आराध्या), जो टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित है, को नियमित रूप से इंसुलिन और शुगर जांच की जरूरत होती है। बच्ची की उम्र कम होने के कारण पिता रोज स्कूल जाकर उसे इंसुलिन देते थे और खाना खिलाते थे।
परिवार के अनुसार, एडमिशन के समय स्कूल प्रबंधन ने सहयोग का भरोसा दिया था, लेकिन कुछ महीनों बाद उनका रवैया बदल गया और वे इस प्रक्रिया में बाधाएं डालने लगे।

रिजल्ट के दिन थमा दी टीसी
सबसे गंभीर आरोप यह है कि वार्षिक परीक्षा के परिणाम वाले दिन ही स्कूल ने दोनों बहनों—14 वर्षीय बड़ी बेटी और 6 वर्षीय छोटी बच्ची—का नाम काटकर ट्रांसफर सर्टिफिकेट (टीसी) दे दिया।
परिजनों का कहना है कि उन्होंने पहले प्रशासन और सीएम हेल्पलाइन में शिकायत की थी, जिसके बाद स्कूल प्रबंधन ने बदले की भावना से यह कदम उठाया।
आर्थिक स्थिति का भी मजाक उड़ाने का आरोप
दिलीप थापर, जो फूड डिलीवरी का काम करते हैं, का कहना है कि वे समय पर फीस जमा करते थे। इसके बावजूद टीसी देकर न सिर्फ बच्चों का भविष्य प्रभावित किया गया, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति का भी मजाक उड़ाया गया।
उन्होंने आरोप लगाया कि स्कूल में मेडिकल सुविधा की कमी के कारण बच्ची को कई बार स्टोर रूम में इंसुलिन लेना पड़ता था, जो बेहद असुविधाजनक और असुरक्षित था।
परिजनों की मांग—कड़ी कार्रवाई हो
पीड़ित परिवार इस मामले में स्कूल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहा है। उनका कहना है कि यह केवल उनके बच्चों का मामला नहीं, बल्कि उन सभी बच्चों का सवाल है जिन्हें विशेष स्वास्थ्य देखभाल की जरूरत होती है।

स्कूल प्रबंधन का पक्ष
वहीं स्कूल के प्रिंसिपल जॉय वर्गीस ने इन आरोपों से अलग पक्ष रखा है। उनका कहना है कि बच्ची के पिता लंच टाइम बढ़ाने और सभी विषय एक ही शिक्षक से पढ़ाने की मांग कर रहे थे, जो स्कूल के लिए संभव नहीं था।
प्रिंसिपल के अनुसार, उन्हें नोटिस देकर पहले ही बताया गया था कि यदि उन्हें असुविधा है, तो वे बच्चों का एडमिशन कहीं और करा सकते हैं और टीसी ले सकते हैं।
डॉक्टर की राय
जिला अस्पताल के मेडिकल ऑफिसर डॉ. सुनील दांगी के अनुसार, डायबिटीज मरीजों के लिए इंसुलिन की मात्रा उनके शुगर लेवल पर निर्भर करती है। यदि शुगर नियंत्रित है तो रोजाना इंसुलिन जरूरी नहीं होता, लेकिन यदि स्तर अनियंत्रित हो जाए तो स्थिति गंभीर हो सकती है।
इससे स्पष्ट है कि ऐसी बीमारी वाले बच्चों को विशेष देखभाल और सहयोग की जरूरत होती है।
शिक्षा और संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल
यह मामला केवल एक स्कूल या एक परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था की संवेदनशीलता पर भी सवाल उठाता है। शिक्षा का अधिकार केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान भी शामिल है।
विशेष रूप से उन बच्चों के लिए जो किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं, स्कूलों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। ऐसे मामलों में सहयोग और समझदारी की अपेक्षा की जाती है, न कि कठोर निर्णयों की।
आगे क्या?
परिवार द्वारा पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के बाद अब प्रशासन की भूमिका अहम हो गई है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।
गुना का यह मामला शिक्षा व्यवस्था में मानवीय दृष्टिकोण की कमी को उजागर करता है। एक ओर जहां बच्चे अपने भविष्य के लिए स्कूल पर निर्भर होते हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसी घटनाएं उनके अधिकारों और विश्वास को झटका देती हैं।
अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है और क्या इस घटना से स्कूलों में संवेदनशीलता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में कोई ठोस बदलाव आता है।