मातृ एवं शिशु मृत्यु दर पर नियंत्रण: प्रशासन की सख्ती और स्वास्थ्य तंत्र की जिम्मेदारी !

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मध्यप्रदेश के सागर जिले में हाल ही में आयोजित जिला स्वास्थ्य समिति की बैठक में कलेक्टर प्रतिभा पाल ने मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को शून्य तक लाने के लिए सख्त निर्देश जारी किए। यह केवल एक प्रशासनिक बैठक नहीं थी, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक जवाबदेह और प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। बैठक में स्पष्ट कर दिया गया कि अब लापरवाही के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा और कार्य में ढिलाई बरतने वाले अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई की जाएगी।

मातृ एवं शिशु मृत्यु दर किसी भी समाज के स्वास्थ्य स्तर का प्रमुख संकेतक होता है। इसे कम करना केवल स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक समन्वित प्रयास है जिसमें प्रशासन, स्वास्थ्य कार्यकर्ता और समाज की सक्रिय भागीदारी आवश्यक होती है। कलेक्टर द्वारा दिए गए निर्देशों में सबसे अधिक जोर हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं (HRPW) की पहचान और उनकी निरंतर निगरानी पर दिया गया। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहल है, क्योंकि अधिकतर मातृ मृत्यु के मामले उन्हीं महिलाओं में होते हैं जिन्हें समय पर उचित देखभाल नहीं मिल पाती।

बैठक में निर्देश दिए गए कि सभी हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की सूची प्रत्येक ब्लॉक चिकित्सा अधिकारी (BMO) के पास उपलब्ध होनी चाहिए। इसके साथ ही एएनएम और आशा कार्यकर्ताओं को इन महिलाओं की नियमित निगरानी करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। आपातकालीन स्थिति में बिना किसी देरी के उन्हें उच्च स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाना सुनिश्चित करना भी आवश्यक बताया गया। यह व्यवस्था जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती को दर्शाती है।

गर्भवती महिलाओं के पंजीयन और उनकी सभी आवश्यक जांचें समय पर कराना भी बैठक का प्रमुख एजेंडा रहा। एएनसी (ANC) जांचों के माध्यम से गर्भावस्था के दौरान संभावित जटिलताओं का समय रहते पता लगाया जा सकता है, जिससे मातृ एवं शिशु दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। कलेक्टर ने यह भी निर्देश दिए कि प्रथम पंजीयन से लेकर चारों अनिवार्य जांचों तक की प्रक्रिया पूरी गंभीरता से पूरी की जाए।

किशोरी बालिकाओं के स्वास्थ्य और पोषण पर भी विशेष ध्यान देने की बात कही गई। यह एक दूरदर्शी कदम है, क्योंकि स्वस्थ किशोरी ही भविष्य में स्वस्थ माता बनती है। स्वच्छता, पोषण और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए गए।

बैठक में आयुष्मान भारत योजना, टीकाकरण, संस्थागत प्रसव और मौसमी बीमारियों की रोकथाम की भी समीक्षा की गई। यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया कि सभी पात्र हितग्राहियों को आयुष्मान कार्ड उपलब्ध हों, जिससे उन्हें समय पर मुफ्त उपचार मिल सके। साथ ही शत-प्रतिशत टीकाकरण सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए ताकि कोई भी बच्चा टीकाकरण से वंचित न रहे।

एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में प्रत्येक नागरिक की ‘आभा आईडी’ बनाने के निर्देश दिए गए। यह डिजिटल हेल्थ आईडी मरीजों के पूरे मेडिकल इतिहास को सुरक्षित रखने में सहायक होगी। इससे डॉक्टरों को इलाज में आसानी होगी और मरीजों को बार-बार दस्तावेज लेकर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। शिक्षा विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग को भी इस कार्य में शामिल किया गया है, जिससे यह अभियान व्यापक स्तर पर सफल हो सके।

टी.बी. उन्मूलन के लिए ‘निक्षय मित्र’ बनाकर पोषण किट वितरण करने के निर्देश दिए गए, जो एक सराहनीय पहल है। इसके अलावा गैर संचारी रोगों (NCD) की समय पर पहचान और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया।

कलेक्टर ने स्वास्थ्य संस्थानों में डॉक्टरों और स्टाफ की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। साथ ही दवाओं की उपलब्धता, साफ-सफाई और मरीजों को बेहतर सुविधाएं देने पर विशेष ध्यान देने को कहा गया। यह स्पष्ट संदेश था कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

समग्र रूप से देखा जाए तो यह बैठक केवल निर्देशों तक सीमित नहीं थी, बल्कि स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करने का एक ठोस प्रयास थी। यदि इन निर्देशों का सही तरीके से पालन किया जाता है, तो निश्चित रूप से मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि प्रशासन की सख्ती, स्वास्थ्य कर्मियों की जिम्मेदारी और समाज की भागीदारी मिलकर ही इस लक्ष्य को प्राप्त कर सकती है। मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि एक सामाजिक दायित्व है जिसे हर स्तर पर गंभीरता से निभाने की आवश्यकता है।

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