सागर के जिला अस्पताल में हाल ही में जारी एक आदेश ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल प्रबंधन द्वारा 6 अप्रैल को जारी निर्देश के अनुसार, इमरजेंसी ड्यूटी पर तैनात मेडिकल ऑफिसर किसी भी मरीज को बिना विशेषज्ञ डॉक्टर की सहमति के रेफर नहीं कर सकते। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि नियम का उल्लंघन करने पर संबंधित डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इस आदेश का असर अब मरीजों पर सीधा पड़ता दिखाई दे रहा है, जहां गंभीर हालत में पहुंचे मरीजों को समय पर रेफर नहीं किया जा रहा।
स्थिति यह है कि जिन विशेषज्ञ डॉक्टरों की अनुमति के बिना मरीज को रेफर करने पर रोक लगाई गई है, वे खुद ही अस्पताल में उपलब्ध नहीं रहते। ऐसे में ड्यूटी पर मौजूद मेडिकल ऑफिसर दुविधा में हैं और कई बार गंभीर मरीजों को भी रेफर करने में देरी हो रही है। इसका खामियाजा मरीजों को अपनी जान जोखिम में डालकर भुगतना पड़ रहा है।
जिला अस्पताल में रोजाना इमरजेंसी में लगभग 60 से 70 मरीज पहुंचते हैं, जिनमें से 15 से 20 मरीज अति गंभीर स्थिति में होते हैं। इसके बावजूद अस्पताल में मूलभूत सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। दोपहर 2 बजे के बाद एक्स-रे की सुविधा बंद हो जाती है, रात 8 बजे के बाद सीटी स्कैन उपलब्ध नहीं रहता और रात 9 बजे के बाद मेडिकल स्टोर भी बंद हो जाता है। ऐसे में रात के समय आने वाले मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

एक मामला बाघराज वार्ड निवासी कंचन शुक्ला का सामने आया, जो शनिवार शाम अपने 4 साल के बेटे को लेकर अस्पताल पहुंचीं। बच्चे की नाक में प्लास्टिक का एक छोटा सितारा फंस गया था। ड्यूटी डॉक्टर ने निकालने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। ईएनटी विशेषज्ञ की जरूरत थी, लेकिन ओपीडी में कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। कंचन ने सिविल सर्जन और आरएमओ को फोन लगाया, लेकिन किसी ने कॉल रिसीव नहीं किया। अंततः उन्हें बच्चे को लेकर बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज (BMC) जाना पड़ा, जहां समस्या का समाधान हुआ।
इसी तरह मकरोनिया निवासी अभय सेन अपने साढ़े तीन साल के बेटे को लेकर अस्पताल पहुंचे, जिसकी नाक में कंकड़ फंस गया था। ड्यूटी डॉक्टर ने ईएनटी विशेषज्ञ को फोन कर बुलाने की कोशिश की, लेकिन डॉक्टर ने इसे इमरजेंसी नहीं मानते हुए सुबह देखने की बात कही। मजबूरी में परिजन बच्चे को बीएमसी ले गए, जहां तुरंत इलाज किया गया।
एक और गंभीर मामला नरयावली थाना क्षेत्र के अजय अहिरवार का है, जो सड़क हादसे में घायल हो गया था। उसके सिर में गंभीर चोट थी और कान से खून बह रहा था। रात 11 बजे उसे जिला अस्पताल लाया गया, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे। मेडिकल ऑफिसर ने उसे वार्ड में भर्ती कर सामान्य इलाज शुरू किया। करीब 4 घंटे बाद, रात 3 बजे उसे बीएमसी रेफर किया गया। इस देरी ने उसकी हालत को और गंभीर बना दिया।

अस्पताल की ओपीडी व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। शाम 5 से 6 बजे तक चलने वाली ओपीडी में अधिकतर विभागों के डॉक्टर अनुपस्थित रहते हैं। शनिवार को निरीक्षण के दौरान केवल दो डॉक्टर ही मौजूद पाए गए, जबकि अन्य विभागों में एक भी विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं था। यह स्थिति केवल एक दिन की नहीं, बल्कि रोजाना की बताई जा रही है।
इस पूरे मामले में सिविल सर्जन डॉ. आरएस जयंत का कहना है कि यह आदेश केवल अनावश्यक रेफरल को रोकने के लिए जारी किया गया है। उनका दावा है कि मरीज की स्थिति को देखते हुए डॉक्टर रेफर करने का निर्णय ले सकते हैं। हालांकि, जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आ रही है, जहां डॉक्टर कार्रवाई के डर से निर्णय लेने में हिचकिचा रहे हैं।
कुल मिलाकर, आदेश और व्यवस्था के बीच फंसे मरीजों को समय पर इलाज और उचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पा रही है। विशेषज्ञों की अनुपस्थिति और सीमित संसाधनों के चलते जिला अस्पताल की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो यह स्थिति और भी खतरनाक हो सकती है।