सागर। देश में जल संकट की बढ़ती चुनौती के बीच Central Ground Water Board की ताजा रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश के कई हिस्सों की चिंताजनक तस्वीर सामने रख दी है। रिपोर्ट के अनुसार मालवा क्षेत्र में भू-जल का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जबकि बुंदेलखंड में भी हालात तेजी से बिगड़ते जा रहे हैं। हालांकि सागर जिले के लिए फिलहाल राहत की खबर है, जहां अधिकांश ब्लॉक अभी सुरक्षित श्रेणी में बने हुए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, राजधानी Bhopal और Ujjain जैसे प्रमुख जिलों में भू-जल की स्थिति गंभीर हो चुकी है। भोपाल में भू-जल दोहन 80 प्रतिशत के पार पहुंच गया है, जबकि उज्जैन में यह स्थिति और भी भयावह है। उज्जैन के तीन ब्लॉकों में 144 प्रतिशत तक पानी का दोहन किया जा रहा है, जो प्राकृतिक रिचार्ज क्षमता से कहीं अधिक है। परिणामस्वरूप, जिले के सभी ब्लॉक ‘रेड अलर्ट’ श्रेणी में आ गए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी क्षेत्र में भू-जल का उपयोग 70 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। इससे अधिक उपयोग होने पर क्षेत्र ‘सेमी-क्रिटिकल’ या ‘क्रिटिकल’ श्रेणी में चला जाता है, जिसका अर्थ है कि वहां जलस्तर तेजी से गिर रहा है और भविष्य में गंभीर संकट की संभावना है।
बुंदेलखंड क्षेत्र में भी हालात तेजी से खराब हो रहे हैं। Tikamgarh जिले के लगभग सभी ब्लॉक रेड जोन की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि Chhatarpur के कई हिस्सों में भी भू-जल का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में इन क्षेत्रों में पानी का संकट और गहराएगा।

रिपोर्ट में सामने आए जमीनी उदाहरण स्थिति की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। उज्जैन जिले की खाचरोद तहसील के पथलासी गांव में 1000 से 1100 फीट तक बोर करने के बावजूद पानी नहीं मिल रहा है। गांव में 24 निजी बोर करवाए गए, जिनमें से केवल तीन ही सफल हो पाए। यहां तक कि हजार फीट गहरे तीन सरकारी बोर भी पूरी तरह सूखे पाए गए।
इसी तरह टीकमगढ़ जिले के माडूमार गांव में 400 फीट गहराई तक बोर करने के बाद भी पानी नहीं मिल रहा। जल संकट के कारण किसान केवल खरीफ फसल ही ले पा रहे हैं, जबकि रबी की खेती लगभग बंद हो चुकी है। यदि कभी रबी की बुवाई करते भी हैं, तो सिंचाई के लिए पानी खरीदना पड़ता है, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है।
हालांकि इन गंभीर हालातों के बीच Sagar जिले के लिए कुछ राहत की स्थिति बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार सागर जिले के सभी 11 ब्लॉक फिलहाल ‘सुरक्षित’ श्रेणी में हैं, क्योंकि यहां भू-जल का उपयोग 70 प्रतिशत से कम है। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि यहां जल संरक्षण और उपयोग के बीच संतुलन अभी बना हुआ है।
भू-जल विशेषज्ञ कुलवंत सिंह (सेवानिवृत्त इंजीनियर) के अनुसार, यदि किसी क्षेत्र में जल का दोहन रिचार्ज से अधिक हो जाता है, तो वहां सूखे जैसी स्थिति बनने लगती है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि वर्तमान गति से भू-जल का दोहन जारी रहा, तो आने वाले समय में जलस्तर और नीचे जाएगा और कई क्षेत्रों में बोरवेल से केवल धूल ही निकलेगी।
यह रिपोर्ट साफ तौर पर संकेत देती है कि जल संरक्षण अब केवल विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है। वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन, फसल चक्र में बदलाव और जल के विवेकपूर्ण उपयोग जैसे उपायों को अपनाना बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभी भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में जल संकट विकराल रूप ले सकता है। ऐसे में प्रशासन के साथ-साथ आम नागरिकों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे जल संरक्षण को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएं।
इस प्रकार, Central Ground Water Board की यह रिपोर्ट एक चेतावनी के रूप में सामने आई है, जो बताती है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में पानी जैसी बुनियादी आवश्यकता भी संकट में पड़ सकती है।