सिनेमा कर्नाटक के सुपरस्टार Yash आज देशभर में अपनी दमदार पहचान बना चुके हैं। ‘केजीएफ’ सीरीज ने उन्हें पैन-इंडिया स्टार बना दिया, लेकिन इस सफलता के पीछे वर्षों का संघर्ष, मेहनत और अटूट जुनून छिपा है। कभी थिएटर में बैकस्टेज काम कर ₹50 कमाने वाले यश आज भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में गिने जाते हैं। उनका सफर उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो छोटे शहरों से बड़े सपने लेकर निकलते हैं।
8 जनवरी 1986 को कर्नाटक के हासन जिले के भुवानाहल्ली गांव में जन्मे यश का असली नाम नवीन कुमार गौड़ा है। उनका बचपन मैसूर में बीता। उनके पिता बीएमटीसी बस ड्राइवर थे, जबकि मां गृहिणी थीं। परिवार आर्थिक रूप से सामान्य था, लेकिन यश के सपने असाधारण थे। बचपन से ही उन्हें अभिनय और मंच की दुनिया आकर्षित करती थी। स्कूल में वे मोनो एक्टिंग, डांस और फैंसी ड्रेस प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते थे। उनके शिक्षक मजाक में उन्हें “हीरो” कहकर बुलाते थे।

यश ने एक इंटरव्यू में बताया था कि बचपन से ही उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें अभिनेता बनना है। उनके पास कोई प्लान-बी नहीं था। वे सिर्फ फिल्मों में काम करना चाहते थे और स्टार बनना चाहते थे। हालांकि परिवार को उनका यह सपना जोखिम भरा लगता था। माता-पिता चाहते थे कि वे पढ़ाई पूरी कर सुरक्षित नौकरी करें।
दसवीं के बाद ही यश अभिनय की दुनिया में जाना चाहते थे, लेकिन घरवालों ने उन्हें पहले पढ़ाई पूरी करने को कहा। उन्होंने पीयूसी (प्री-यूनिवर्सिटी कोर्स) किया, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें महसूस होने लगा कि उनका मन पढ़ाई में नहीं लग रहा है। वे जल्द से जल्द अभिनय सीखना चाहते थे।
उस समय परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे किसी बड़े एक्टिंग इंस्टीट्यूट की फीस भर सकें। ऐसे में यश ने थिएटर का रास्ता चुना। परिवार की मर्जी के खिलाफ वे सिर्फ ₹300 लेकर बेंगलुरु पहुंच गए। एक छोटे शहर से बड़े महानगर में आना उनके लिए आसान नहीं था। शहर उन्हें डरावना लगता था, लेकिन अभिनेता बनने का जुनून उनसे हर मुश्किल पार करवा रहा था।
बेंगलुरु पहुंचकर उन्होंने ‘बेनाका थिएटर ग्रुप’ जॉइन किया। यहां वे बैकस्टेज काम करने लगे। थिएटर में पर्दे के पीछे काम करते हुए वे कलाकारों की रिहर्सल देखते और उनके डायलॉग याद करते थे। अगर कोई कलाकार नहीं आता या देर हो जाती, तो यश उसकी जगह संवाद बोलने लगते। धीरे-धीरे वे थिएटर ग्रुप के “इमरजेंसी एक्टर” बन गए।
उस समय बैकस्टेज काम के बदले उन्हें सिर्फ ₹50 मिलते थे। यही उनकी कमाई थी और इसी से वे अपना खर्च चलाते थे। रहने की स्थायी जगह भी नहीं थी। कई बार उन्हें बेहद कठिन परिस्थितियों में दिन गुजारने पड़े, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

यश का पहला स्टेज परफॉर्मेंस मुंबई में हुआ। थिएटर ग्रुप के साथ वे माटुंगा स्थित मैसूर एसोसिएशन पहुंचे थे। वहां एक छोटे रोल के लिए कलाकार नहीं आया, तो यश ने खुद आगे बढ़कर भूमिका निभाने की इच्छा जताई। शुरुआत में निर्देशक ने उन्हें रोका, लेकिन उनके आत्मविश्वास ने सबको प्रभावित किया। स्टेज पर उनका प्रदर्शन पसंद किया गया और यही उनके अभिनय सफर का अहम मोड़ बना।
थिएटर के दौरान ही यश ने बेंगलुरु के के.एल.ई. कॉलेज से बैचलर ऑफ आर्ट्स की पढ़ाई भी पूरी की। संघर्ष के साथ उन्होंने पढ़ाई और अभिनय दोनों को संभाला।
इसके बाद उन्हें टेलीविजन में काम मिलने लगा। शुरुआत में वे टीवी में काम नहीं करना चाहते थे, क्योंकि उनका सपना फिल्मों में स्टार बनने का था। उन्हें लगता था कि टीवी उन्हें वह पहचान नहीं दिला पाएगा, जिसकी वे कल्पना करते थे। लेकिन बाद में उन्होंने महसूस किया कि टीवी अभिनय सीखने का बेहतरीन माध्यम है।
साल 2004 में उन्होंने टीवी सीरियल ‘उत्तरायण’ से शुरुआत की। इसके बाद वे ‘नंदा गोकुला’, ‘माले बिल्लू’ और ‘प्रीति इल्लादा मेले’ जैसे धारावाहिकों में नजर आए। शुरुआत में उन्हें ₹500 प्रतिदिन मिलते थे। बाद में उनकी फीस बढ़कर ₹1500 प्रतिदिन हो गई।
यश बताते हैं कि उस दौर में टीवी कलाकारों को अपने कपड़े खुद खरीदने पड़ते थे। जहां दूसरे कलाकार पैसे बचाते थे, वहीं यश अपनी कमाई कपड़ों और लुक पर खर्च करते थे। लोग उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन वे हमेशा कहते थे कि उनका सपना सुपरस्टार बनना है और इसके लिए खुद पर निवेश जरूरी है।
टीवी के बाद उन्होंने फिल्मों की ओर कदम बढ़ाया। साल 2007 में फिल्म ‘जंबाड़ा हुडुगी’ से उन्होंने फिल्मों में एंट्री की। हालांकि इसमें उनका रोल छोटा था। इसके बाद 2008 में आई फिल्म Moggina Manasu ने उन्हें पहचान दिलाई। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला।
उनकी पहली लीड फिल्म ‘रॉकी’ बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही। इसके बाद भी कई फिल्में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाईं। हालांकि यश ने लगातार मेहनत जारी रखी। साल 2010 में आई ‘मोडलसाला’ उनकी पहली बड़ी सोलो हिट साबित हुई। इसके बाद ‘किरातका’, ‘ड्रामा’, ‘गजकेसरी’ और Mr. and Mrs. Ramachari जैसी फिल्मों ने उन्हें कन्नड़ सिनेमा का बड़ा स्टार बना दिया।
यश का करियर असली ऊंचाई पर तब पहुंचा, जब निर्देशक Prashanth Neel ने उन्हें K.G.F: Chapter 1 की कहानी सुनाई। यश को शुरुआत से ही इस प्रोजेक्ट पर भरोसा था। उन्होंने महसूस किया कि यह फिल्म भारतीय सिनेमा में बड़ा बदलाव ला सकती है।
साल 2018 में रिलीज हुई K.G.F: Chapter 1 ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा दिया। फिल्म में उनके ‘रॉकी भाई’ किरदार को देशभर में जबरदस्त लोकप्रियता मिली। फिल्म कई भाषाओं में रिलीज हुई और करीब ₹250 करोड़ की कमाई की।
इसके बाद 2022 में रिलीज हुई K.G.F: Chapter 2 ने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। फिल्म ने दुनिया भर में ₹1200 करोड़ से ज्यादा का कारोबार किया। हिंदी वर्जन ने अकेले ₹434 करोड़ से अधिक की कमाई की। यह पहली कन्नड़ फिल्म बनी जिसने ₹1000 करोड़ क्लब में जगह बनाई।
केजीएफ की सफलता के बाद यश पैन-इंडिया सुपरस्टार बन गए। आज उनकी फैन फॉलोइंग पूरे देश में फैली हुई है। उनकी फिल्मों का इंतजार सिर्फ कर्नाटक ही नहीं, बल्कि हिंदी बेल्ट और दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में भी किया जाता है।
आने वाले समय में भी यश कई बड़े प्रोजेक्ट्स में नजर आने वाले हैं। उनकी फिल्म Toxic: A Fairy Tale for Grown-Ups चर्चा में है। इसके अलावा वे Ramayana: Part 1 में रावण की भूमिका निभाते दिखाई देंगे। इस फिल्म में Ranbir Kapoor भगवान राम और Sai Pallavi सीता की भूमिका निभाएंगी।
यश की कहानी साबित करती है कि मेहनत, धैर्य और सपनों पर विश्वास हो तो संघर्ष कभी रास्ता नहीं रोक सकता। ₹300 लेकर बेंगलुरु पहुंचे उस युवक ने आज भारतीय सिनेमा में अपनी अलग पहचान बना ली है।