Bhopal के पॉश इलाके चार इमली से एक बेहद संवेदनशील और दुखद घटना सामने आई है। वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी Sanjeev Kanchan और जज Renuka Kanchan की 17 वर्षीय बेटी ने कथित तौर पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। घटना ने प्रशासनिक और न्यायिक गलियारों के साथ पूरे शहर को झकझोर दिया है।
पुलिस की शुरुआती जांच में सामने आया है कि छात्रा हाल ही में 10वीं पास कर 11वीं कक्षा में गई थी और वह रातीबड़ स्थित एक प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ती थी। बताया जा रहा है कि पढ़ाई और मानसिक दबाव से वह परेशान चल रही थी।
मोबाइल फोन को लेकर हुई थी पूछताछ
पुलिस के अनुसार, छात्रा की मां ने उसे एक मोबाइल फोन के साथ देखा था। परिवार ने उसे मोबाइल नहीं दिलाया था, इसलिए उससे पूछताछ की गई और समझाइश दी गई। माना जा रहा है कि इसी बात से छात्रा भावनात्मक रूप से आहत हो गई।

घटना के समय माता-पिता दोनों अपने-अपने कार्यालय में थे। जब घर में छात्रा की गतिविधि संदिग्ध लगी, तब परिजनों ने पुलिस को सूचना दी।
सुसाइड नोट में छलका दर्द
पुलिस को मौके से एक छोटा सुसाइड नोट मिला है। उसमें छात्रा ने लिखा—
“मम्मी-पापा, मैं आपसे बहुत प्यार करती हूं, लेकिन मैं आपकी अच्छी बेटी नहीं बन सकी। आई एम सॉरी।”
हालांकि, नोट में आत्महत्या के स्पष्ट कारण का उल्लेख नहीं किया गया है।
3 महीने की उम्र में लिया था गोद
पुलिस कमिश्नर Sanjay Singh ने पुष्टि की है कि बच्ची को आईपीएस अधिकारी और उनकी पत्नी ने महज तीन महीने की उम्र में कानूनी प्रक्रिया के तहत गोद लिया था। परिवार ने उसे बेहद प्यार और अच्छे माहौल में पाला था।
इस घटना के बाद परिवार गहरे सदमे में है और फिलहाल विस्तृत बयान दर्ज नहीं हो सके हैं।
सोशल मीडिया और मोबाइल की जांच
पुलिस और साइबर सेल छात्रा के मोबाइल फोन, सोशल मीडिया अकाउंट्स और हालिया गतिविधियों की जांच कर रही है। अधिकारियों का मानना है कि छात्रा के मानसिक तनाव, दोस्ती, पढ़ाई के दबाव या किसी अन्य कारण की गहराई से जांच जरूरी है।

इसके अलावा उसके दोस्तों और सहपाठियों से भी पूछताछ की जाएगी ताकि यह पता लगाया जा सके कि हाल के दिनों में उसके व्यवहार में कोई बदलाव आया था या नहीं।
हर एंगल से जांच जारी
Madhya Pradesh Police का कहना है कि फिलहाल किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, फॉरेंसिक जांच और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
यह घटना एक बार फिर किशोर मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई के दबाव और अभिभावकों व बच्चों के बीच संवाद की आवश्यकता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।