बांदरी। भगवान श्रीराम के आदर्श जीवन, राम नाम की महिमा और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से आयोजित पवनसुत हनुमान जी की कथा में युवा नेता अविराज सिंह ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि राम कथा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली आध्यात्मिक शक्ति है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव स्वयं श्रीराम के सबसे बड़े भक्त हैं और भगवान श्रीराम भी शिवजी की आराधना करते हैं। यही कारण है कि सनातन परंपरा में शिव और राम का संबंध भक्ति, श्रद्धा और आदर्श का प्रतीक माना जाता है।
अविराज सिंह ने कहा कि पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव स्वयं कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति एक बार भी राम नाम का जाप करता है तो उसे विष्णु भगवान के हजार नामों के जाप के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव निरंतर राम नाम का स्मरण करते हैं और उन्हें राम कथा सुनने तथा पढ़ने से अधिक प्रिय कुछ भी नहीं है। शिवजी स्वयं मानते हैं कि कलयुग में सभी दुखों, कष्टों और परेशानियों से दूर रहने का सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग श्रीराम कथा का श्रवण एवं राम नाम का स्मरण है।
कार्यक्रम में व्यासपीठ पर विराजमान परम पूज्य साध्वी दीपेश्वरी देवी जी का चरण वंदन करते हुए अविराज सिंह ने उपस्थित वरिष्ठजनों, मातृशक्ति, ग्रामीणों और युवाओं का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि यदि सत्य को समझना है तो भगवान श्रीराम के जीवन को समझना होगा और यदि प्रेम का वास्तविक स्वरूप जानना है तो माता सीता के जीवन का अध्ययन करना चाहिए। वहीं करुणा, सेवा और समर्पण की भावना को समझने के लिए हनुमान जी के चरणों में स्थान प्राप्त करना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि रामायण केवल एक ग्रंथ नहीं बल्कि मानव जीवन के लिए आदर्श आचार संहिता है। रामायण मनुष्य को सत्य, प्रेम और करुणा का संदेश देती है। जब किसी व्यक्ति के जीवन में ये तीनों गुण आ जाते हैं तो उसका जीवन स्वयं रामायण बन जाता है। राम कथा मनुष्य को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सही मार्ग दिखाती है तथा समाज में सद्भाव, संस्कार और नैतिक मूल्यों को मजबूत करती है।
अविराज सिंह ने भारतीय संस्कृति में प्रातःकालीन जीवन शैली के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण दोनों ही प्रतिदिन सूर्योदय से पहले जागते थे और सूर्य भगवान को अर्घ्य अर्पित करते थे। हमारे धर्मग्रंथों में सूर्योदय से पहले जागने को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति प्रतिदिन सुबह सूर्य की पहली किरण को प्रणाम करता है और सूर्यदेव की उपासना करता है, वह अनेक रोगों और मानसिक तनाव से दूर रहता है। आधुनिक विज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि सुबह का समय स्वास्थ्य, एकाग्रता और मानसिक शांति के लिए अत्यंत लाभकारी होता है।
उन्होंने कहा कि सूर्य भगवान को प्रणाम करने के बाद भगवान श्रीराम अपने माता-पिता के चरण स्पर्श करते थे। भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है। शास्त्रों में पिता को सूर्य देव और माता को चंद्र देव का स्वरूप बताया गया है। इसलिए माता-पिता की सेवा और सम्मान करना सभी देवी-देवताओं की आराधना के समान माना गया है।
अपने संबोधन में अविराज सिंह ने ब्रह्म मुहूर्त के महत्व को भी विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि सुबह चार बजे से साढ़े पांच बजे तक का समय ब्रह्म मुहूर्त कहलाता है और इसे देवी-देवताओं का समय माना जाता है। इस समय भगवान का नाम जाप करने, ध्यान लगाने और पूजा-अर्चना करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। उन्होंने रामचरितमानस की चौपाई “जासु नाम जपि सुनहु भवानी, भव बंधन काटहि नर ज्ञानी” का उल्लेख करते हुए कहा कि श्रीराम नाम का जाप मनुष्य को सांसारिक बंधनों से मुक्त करने की शक्ति रखता है। राम नाम जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक शक्ति का संचार करता है।
भगवान श्रीराम के संघर्षपूर्ण जीवन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम ने गुरु वशिष्ठ के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त की और वन जीवन को निकट से समझा। आश्रम जीवन ने उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करना सिखाया। यही कारण था कि जब उन्हें 14 वर्षों का वनवास मिला तो उन्होंने बिना किसी भय और शिकायत के उसे स्वीकार किया। भगवान श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, धैर्य, साहस और कर्तव्यनिष्ठा नहीं छोड़नी चाहिए।
उन्होंने भगवान श्रीराम और उनके भाइयों के प्रेम का उल्लेख करते हुए कहा कि जब चारों भाइयों का जन्म हुआ तो लक्ष्मण जी लगातार रोते रहते थे। अनेक ऋषि-मुनियों और ज्योतिषाचार्यों के प्रयासों के बाद भी इसका कारण समझ नहीं आया। अंततः जब लक्ष्मण जी को भगवान श्रीराम के चरणों में रखा गया तो उन्होंने रोना बंद कर दिया। यह प्रसंग भाई-भाई के प्रेम, समर्पण और आत्मीयता का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कहा कि आज समाज को भी ऐसे ही प्रेम, सम्मान और भाईचारे की आवश्यकता है।
युवाओं को प्रेरित करते हुए अविराज सिंह ने कहा कि व्यक्ति की वास्तविक योग्यता तभी सामने आती है जब वह चुनौतियों को स्वीकार करता है। भगवान श्रीराम ने शिव धनुष उठाने की चुनौती स्वीकार की और जब उन्होंने धनुष उठाया तो उसकी ध्वनि तीनों लोकों में गूंज उठी। उसी क्षण संसार ने उनकी शक्ति और क्षमता को पहचाना। उन्होंने कहा कि युवाओं को जीवन की कठिनाइयों से घबराना नहीं चाहिए बल्कि साहस और आत्मविश्वास के साथ उनका सामना करना चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में अविराज सिंह ने कहा कि श्रीराम कथा मनुष्य को धर्म, संस्कार, आदर्श जीवन और समाज सेवा की प्रेरणा देती है। उन्होंने राम भक्ति से जुड़े भजनों का गायन करते हुए “जय श्रीराम” के उद्घोष के साथ वातावरण को भक्तिमय बना दिया। कथा स्थल पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने श्रद्धा एवं भक्ति भाव से कथा का श्रवण कर आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति की।