मोबाइल और लैपटॉप की लत युवाओं को बना रही बीमार: 25 से 35 साल की उम्र में बढ़ रहे स्लिप डिस्क और पैरालिसिस के मामले !

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भोपाल। बदलती जीवनशैली, घंटों मोबाइल और लैपटॉप पर झुके रहकर काम करने की आदत अब युवाओं की सेहत पर गंभीर असर डाल रही है। कभी बढ़ती उम्र की बीमारी मानी जाने वाली स्लिप डिस्क अब युवाओं और किशोरों तक पहुंच चुकी है। राजधानी भोपाल के अस्पतालों में रोज ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां 25 से 35 वर्ष की उम्र के युवा स्लिप डिस्क के कारण लकवे (पैरालिसिस) की स्थिति तक पहुंच रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल लाइफस्टाइल और लंबे समय तक गलत पोश्चर में बैठने की आदत रीढ़ की हड्डी को तेजी से नुकसान पहुंचा रही है। कई मामलों में मरीजों को शुरुआती लक्षणों का एहसास तक नहीं होता और जब जांच होती है, तब तक बीमारी गंभीर स्तर पर पहुंच चुकी होती है।

19 वर्षीय खिलाड़ी भी हुई स्लिप डिस्क की शिकार

भोपाल की 19 वर्षीय ज्योति (बदला हुआ नाम) इसका एक बड़ा उदाहरण है। ज्योति नियमित रूप से लॉन टेनिस की प्रैक्टिस करती थी और शारीरिक रूप से पूरी तरह फिट थी। लेकिन पढ़ाई और मोबाइल के अत्यधिक उपयोग के कारण वह लंबे समय तक झुककर बैठती थी।

शुरुआत में उसे कमर में हल्का दर्द और पैरों में झुनझुनी महसूस हुई। उसने इसे सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज कर दिया। धीरे-धीरे दर्द बढ़ने लगा और स्थिति गंभीर हो गई। मेडिकल जांच में पता चला कि उसे एडवांस स्टेज का स्लिप डिस्क है, जिसमें नसों पर लगातार दबाव बन रहा था।

डॉक्टरों के अनुसार यदि समय पर इलाज नहीं कराया जाता तो यह मामला पैरालिसिस में भी बदल सकता था।

वर्क फ्रॉम होम बना बड़ी वजह

26 वर्षीय कॉर्पोरेट प्रोफेशनल विजय मिश्रा भी इसी समस्या का शिकार हुए। वर्क फ्रॉम होम के दौरान वे रोजाना 8 से 10 घंटे लैपटॉप पर बैठकर काम करते थे। धीरे-धीरे उनकी जीवनशैली पूरी तरह निष्क्रिय हो गई। न नियमित व्यायाम, न पैदल चलना और न ही शारीरिक गतिविधियां।

कुछ समय बाद उन्हें पैरों में कमजोरी और सुन्नपन महसूस होने लगा। शुरुआत में उन्होंने इसे सामान्य थकान समझा, लेकिन एक दिन अचानक खड़े होने में परेशानी होने लगी। एमआरआई जांच में पता चला कि स्लिप डिस्क के कारण नसों पर गंभीर दबाव पड़ चुका है और वे पैरालिसिस की स्थिति के करीब पहुंच गए हैं।

45 साल से 25 साल की उम्र तक पहुंची बीमारी

ऑर्थो स्पाइन और स्पोर्ट्स इंजरी विशेषज्ञ Dr. Pragyesh Saxena के अनुसार पिछले तीन वर्षों में इस बीमारी का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है।

उनका कहना है कि कुछ वर्ष पहले तक स्लिप डिस्क के अधिकांश मरीज 45 वर्ष से अधिक आयु के होते थे। 100 मरीजों में लगभग 80 प्रतिशत मरीज इसी आयु वर्ग के होते थे। लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।

आज उनके पास आने वाले मरीजों में 70 से 80 प्रतिशत लोग 25 से 35 वर्ष की उम्र के हैं। यानी करियर की शुरुआत और सबसे सक्रिय उम्र में ही लोग रीढ़ की गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

रोजाना सामने आ रहे गंभीर मामले

विशेषज्ञों के अनुसार हर दिन 60 से 70 स्लिप डिस्क के मरीज उपचार के लिए पहुंच रहे हैं। इनमें से 4 से 5 मरीज ऐसे होते हैं जिनमें पैरालिसिस हो चुका होता है या होने की संभावना बेहद अधिक होती है।

चिंता की बात यह है कि अधिकांश मरीजों को अपनी बीमारी की गंभीरता का अंदाजा नहीं होता। कई बार दर्द बहुत कम होता है या देर से शुरू होता है, जिससे लोग समय पर जांच नहीं कराते।

कैसे होता है स्लिप डिस्क?

मानव रीढ़ की हड्डी के बीच मौजूद डिस्क एक कुशन की तरह काम करती है। यह शरीर का वजन संतुलित रखने और झटकों को सहने में मदद करती है।

जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक झुककर बैठता है या गलत पोश्चर में काम करता है तो डिस्क पर लगातार दबाव पड़ता है। धीरे-धीरे डिस्क अपनी जगह से खिसकने लगती है। इसे ही स्लिप डिस्क कहा जाता है।

जब यह बाहर निकलती है तो आसपास की नसों को दबाने लगती है। यही नसें शरीर को चलने-फिरने और संतुलन बनाए रखने में मदद करती हैं। नसों पर लगातार दबाव पड़ने से पैरों में झुनझुनी, कमजोरी, सुन्नपन और गंभीर स्थिति में पैरालिसिस तक हो सकता है।

मोबाइल और लैपटॉप सबसे बड़े जिम्मेदार

डॉ. सक्सेना के अनुसार आज की जीवनशैली में लगभग 90 प्रतिशत गतिविधियां झुककर की जाती हैं। मोबाइल देखना, लैपटॉप पर काम करना, ऑनलाइन पढ़ाई करना या मनोरंजन के लिए स्क्रीन का उपयोग करना—इन सभी में शरीर का पोश्चर खराब हो जाता है।

लंबे समय तक झुकी हुई स्थिति में रहने से रीढ़ की हड्डी पर असामान्य दबाव पड़ता है, जो धीरे-धीरे गंभीर बीमारी का रूप ले लेता है।

बचाव के लिए क्या करें?

विशेषज्ञों का कहना है कि सही पोश्चर और नियमित शारीरिक गतिविधि से इस समस्या से काफी हद तक बचा जा सकता है।

  • हर 30 से 40 मिनट में बैठने की स्थिति बदलें।
  • लगातार काम के बीच छोटे-छोटे ब्रेक लें।
  • मोबाइल को आंखों के स्तर पर रखकर उपयोग करें।
  • लैपटॉप और कंप्यूटर पर काम करते समय रीढ़ सीधी रखें।
  • नियमित रूप से स्ट्रेचिंग और बैक एक्सरसाइज करें।
  • रोज कम से कम 30 मिनट पैदल चलें।
  • कमर दर्द या झुनझुनी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करें।

युवाओं के लिए चेतावनी

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्तमान डिजिटल जीवनशैली में सुधार नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में स्लिप डिस्क और पैरालिसिस जैसी समस्याएं और तेजी से बढ़ सकती हैं। जिस बीमारी को कभी बुजुर्गों की समस्या माना जाता था, वह अब युवाओं और किशोरों के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। सही समय पर जागरूकता, नियमित व्यायाम और बेहतर पोश्चर ही इससे बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।

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