डॉक्टर धरती पर भगवान का रूप होते हैं” — यह कहावत बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज (बीएमसी), सागर के डॉक्टरों ने एक बार फिर सच कर दिखाई है। जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही एक गर्भवती महिला को, जिनकी 90 प्रतिशत मृत्यु की संभावना थी, डॉक्टरों ने अपने परिश्रम, कौशल और समर्पण से नवजीवन दिया। यह सिर्फ एक चिकित्सा उपलब्धि नहीं बल्कि मानवीय संवेदना, ज़िम्मेदारी और पेशेवर दक्षता का अद्वितीय उदाहरण बन गया है।

मरणासन्न अवस्था में पहुंची महिला, ब्लड प्रेशर और नब्ज हो गई थी गायब
यह घटना 28 जुलाई 2025 की है, जब राहतगढ़ निवासी गर्भवती महिला शिफा कुरैशी पत्नी हसीन कुरैशी को बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के गायनी विभाग में गंभीर अवस्था में लाया गया। महिला को मिर्गी के झटके आ रहे थे, और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की मौत पहले ही हो चुकी थी। जब उसे अस्पताल लाया गया, तब उसकी सांसें बंद थीं, नब्ज महसूस नहीं हो रही थी और ब्लड प्रेशर भी शून्य था।

स्थिति अत्यंत नाजुक थी, लेकिन डॉक्टरों ने हार नहीं मानी। गायनी विभाग की डॉक्टर वर्षा और डॉक्टर अभय ने सीपीसीआर (Cardiopulmonary Cerebral Resuscitation) देकर महिला को कृत्रिम रूप से जीवित रखने का प्रयास किया। महिला को तुरंत वेंटिलेटर पर शिफ्ट किया गया और रक्तचाप बढ़ाने की दवाएं दी गईं। कुछ ही समय बाद महिला की नब्ज में हरकत दिखाई दी और ब्लड प्रेशर धीरे-धीरे सामान्य होने लगा। यह डॉक्टरों की पहली जीत थी।
ऑपरेशन था चुनौतीपूर्ण: पहली बार वेंटिलेटर पर हुआ सिजेरियन
अब सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मृत भ्रूण को पेट से बाहर निकालना आवश्यक था, क्योंकि वह गंभीर संक्रमण का कारण बन सकता था। लेकिन यह ऑपरेशन सामान्य नहीं था — महिला अब भी वेंटिलेटर पर थी और बेहोश अवस्था में थी। बीएमसी के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब किसी मरीज का ऑपरेशन वेंटिलेटर पर रहते हुए किया जाना था।
स्थिति की गंभीरता को समझते हुए डॉक्टरों ने परिवार को सभी संभावनाओं और जोखिमों से अवगत कराया। स्त्री रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शीला जैन और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रियंका पटेल ने सिजेरियन ऑपरेशन की कमान संभाली, वहीं एनेस्थीसिया विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सर्वेश जैन, डॉ. मोहम्मद इलियास और डॉ. अजय सिंह ने वेंटिलेटर और बेहोशी की स्थिति को नियंत्रित किया।
पूरे समन्वय और दक्षता के साथ ऑपरेशन किया गया और मृत भ्रूण को सफलतापूर्वक बाहर निकाला गया। यह न केवल तकनीकी रूप से जटिल था, बल्कि भावनात्मक रूप से भी अत्यंत संवेदनशील मामला था।
चार दिन की निगरानी के बाद होश में आई महिला, अब डिस्चार्ज के लिए तैयार
ऑपरेशन के बाद महिला को आईसीयू में रखा गया और अगले चार दिन डॉक्टरों की टीम ने लगातार निगरानी की। डॉक्टरों की मेहनत रंग लाई — 4 दिन बाद, बुधवार को महिला होश में आ गई। जैसे ही आंखें खुलीं, परिजनों की आंखों से आंसू बह निकले और डॉक्टरों के प्रति उनका आभार शब्दों में बयां नहीं हो सका।
अब महिला पूरी तरह से स्वस्थ है और जल्द ही डिस्चार्ज कर दी जाएगी। यह घटना बीएमसी के लिए मील का पत्थर है और चिकित्सा क्षेत्र में अद्भुत उपलब्धि मानी जा रही है।
डीन और प्रशासन ने की डॉक्टरों की प्रशंसा
बीएमसी के डीन डॉ. पीएस ठाकुर और अधीक्षक डॉ. राजेश जैन ने गायनी विभाग के डॉक्टर्स की टीम की सराहना करते हुए कहा कि यह एक असाधारण कार्य है। उन्होंने बताया कि गायनी विभाग में प्रतिदिन औसतन 40 मरीज आते हैं, और स्टाफ की कमी के बावजूद यह उपलब्धि सराहनीय है। वर्तमान में विभाग में 7 स्त्री रोग विशेषज्ञ, 8 पीजी और सीमित नर्सिंग स्टाफ कार्यरत हैं, जिन्हें और बढ़ाने के प्रयास जारी हैं।
डॉ. विशाल भदकारिया, बीएमसी के मीडिया प्रभारी ने भी बताया कि किस तरह डॉक्टरों की सूझबूझ और टीम वर्क ने एक असंभव को संभव कर दिखाया। उन्होंने कहा, “यह सिर्फ चिकित्सा नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा का मामला था।”
आभार में डूबे परिजन
शिफा कुरैशी के परिजन अब भी डॉक्टरों के आभार में डूबे हुए हैं। उन्होंने कहा, “हमने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी, लेकिन बीएमसी के डॉक्टरों ने चमत्कार कर दिखाया। यह उनके समर्पण और भगवान की कृपा का नतीजा है कि आज हमारी बेटी फिर से हमारे बीच है।”
यह कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं, बल्कि उन डॉक्टरों की है जो हर दिन अपनी जान की परवाह किए बिना दूसरों को जीवन देते हैं। बीएमसी सागर की यह घटना यह संदेश देती है कि जब नीयत, मेहनत और इंसानियत साथ हो, तो जीवन भी मौत को मात दे सकता है।