बीना विधानसभा क्षेत्र की खुरई तहसील के ग्राम पंचायत खैजरा के अंतर्गत आने वाले कोहा गांव के लोग इस समय एक गंभीर और मानवीय समस्या से जूझ रहे हैं। यहां का शमशान घाट जाने वाला रास्ता पूरी तरह से जर्जर और गड्ढों से भरा हुआ है। बरसात के दिनों में यह मार्ग दलदल और कीचड़ में बदल जाता है। स्थिति यह है कि ग्रामीणों को अपने प्रियजनों की अंतिम यात्रा तक कीचड़ और गड्ढों के बीच से निकालनी पड़ रही है।

अंतिम संस्कार तक नहीं हो पा रहा सम्मानजनक
गांव के बुजुर्ग ग्रामीण रामलाल यादव ने अपनी व्यथा साझा करते हुए कहा कि अंतिम संस्कार के समय जब लोग शवयात्रा लेकर निकलते हैं, तो अर्थी कीचड़ में फंस जाती है। अर्थी उठाने वालों को घुटनों तक धंसीचपचप मिट्टी में चलना पड़ता है। कभी-कभी कीचड़ में फिसलकर अर्थी गिर जाने जैसी शर्मनाक और दुखद स्थिति भी सामने आती है।
यह सिर्फ सड़क की समस्या नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं और मृतक के सम्मान से जुड़ा प्रश्न है। आखिरकार, हर इंसान की आखिरी यात्रा उसके पूरे जीवन की सबसे गंभीर और भावनात्मक घड़ी होती है।
नेताओं और अधिकारियों के वादे, लेकिन जमीनी हकीकत शून्य
ग्रामीण गोविंद लोधी ने बताया कि इस समस्या को पंचायत बैठकों में कई बार उठाया गया। अधिकारियों और नेताओं ने बार-बार आश्वासन तो दिया, लेकिन काम की गति कभी तेज नहीं हुई।
चुनाव आते हैं तो नेता विकास और सुधार का वादा करते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही सब कुछ धूल फांकने लगता है। आज भी गांववाले उसी दलदल से गुजरने को मजबूर हैं।
बरसात में नर्क जैसी स्थिति
बरसात के दिनों में तो हालात और भी बिगड़ जाते हैं। पानी भर जाने से पूरा रास्ता कीचड़ और दलदल में तब्दील हो जाता है। अंतिम यात्रा निकालने वाले लोग गम और पीड़ा के बीच अपनी श्रद्धा को निभाने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनका दर्द देखने वाला कोई नहीं है।
गांव की महिलाएं बताती हैं कि बरसात में तो बच्चों और बुजुर्गों के पैरों में जख्म हो जाते हैं। शमशान घाट तक पहुंचना किसी यातना से कम नहीं लगता।

ग्रामीणों की चेतावनी – करेंगे आंदोलन
गांव के लोग अब और चुप बैठने के मूड में नहीं हैं। उन्होंने साफ कहा है कि यदि जल्द ही सड़क की मरम्मत नहीं कराई गई, तो वे सामूहिक आंदोलन करेंगे। उनका कहना है कि यह किसी सुविधा का मुद्दा भर नहीं है, बल्कि यह इंसानियत, सम्मान और संवेदनाओं से जुड़ा हुआ सवाल है।
पंचायत सचिव का बयान
पंचायत सचिव ने इस विषय पर कहा कि सड़क निर्माण का प्रस्ताव तैयार है और स्वीकृति मिलते ही काम शुरू कर दिया जाएगा। लेकिन ग्रामीणों को इस बात पर भरोसा नहीं है, क्योंकि वे वर्षों से सिर्फ आश्वासन ही सुनते आ रहे हैं।
निष्कर्ष
कोहा गांव की यह समस्या केवल एक गांव या एक रास्ते की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरे ग्रामीण भारत की उस सच्चाई को दर्शाती है, जहां विकास और मानवीय गरिमा की बातें तो खूब होती हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर हालात बिल्कुल विपरीत हैं।
आज जब सरकारें डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी की बातें कर रही हैं, वहीं कोहा गांव के लोग अपने प्रियजनों की शवयात्रा तक सम्मानजनक ढंग से नहीं निकाल पा रहे।
यह सवाल उठता है कि क्या विकास का कोई अर्थ है, जब इंसान अपनी अंतिम यात्रा तक अपमान और कठिनाई से गुजरने को मजबूर हो?