सागर, 20 अगस्त 2025।
मध्यप्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत जिले में महिलाओं द्वारा संचालित गौशालाएं अब केवल गोपालन तक सीमित नहीं रहीं। यहाँ महिलाओं ने आत्मनिर्भरता की दिशा में एक नया अध्याय लिखना शुरू कर दिया है। गोबर और गोमूत्र से उपयोगी उत्पाद बनाने की पहल ने इन ग्रामीण महिलाओं के जीवन में नई रोशनी जलाई है।
कलेक्टर के मार्गदर्शन में पहल
जिले के कलेक्टर श्री संदीप जी.आर. के मार्गदर्शन में यह अभिनव पहल शुरू की गई है। उनके निर्देश पर महिला स्व-सहायता समूहों से जुड़ी गौशाला संचालक महिलाओं को प्रशिक्षण देकर गौ-आधारित उत्पाद निर्माण की ओर प्रेरित किया जा रहा है। इससे गौशालाओं को वित्तीय मजबूती तो मिलेगी ही, साथ ही महिलाओं को अतिरिक्त आय का साधन भी उपलब्ध होगा।
तीन चरणों में चल रहा प्रशिक्षण

साकेत धाम गौशाला में तीन चरणों में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। पहले चरण का प्रशिक्षण मंगलवार को संपन्न हुआ, वहीं दूसरे चरण में साबुन निर्माण की विधि सिखाई गई। प्रशिक्षण में दलपतपुर की सरस्वती लोधी, मराठा की मीरा पटेल, बामूरा भेड़ की गीता लोधी, डोंगर सलैया की मीराबाई एवं राधारानी, तथा समनापुर से रूपरानी सहित कुल 15 महिलाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
15 प्रकार के उत्पादों की ट्रेनिंग
महिलाओं को प्रशिक्षण में पंचगव्य आई ड्रॉप, धूपबत्ती, अगरबत्ती, हवन सामग्री, प्राकृतिक साबुन, जैविक कीटनाशक और फर्श की सफाई के तरल जैसे लगभग 15 प्रकार के उत्पादों के निर्माण की विधियां विस्तार से बताई जा रही हैं। इन उत्पादों की बाजार में अच्छी मांग है, जिससे महिलाओं को स्थायी आय का स्रोत मिल सकता है।
आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम
इस पहल से गौशालाओं का संचालन आत्मनिर्भर मॉडल पर आधारित होगा। पहले जहाँ गौशालाएं केवल चारे और रखरखाव के लिए दान पर निर्भर रहती थीं, वहीं अब उत्पाद निर्माण से आर्थिक मजबूती प्राप्त होगी। दूसरी ओर ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिलेगा।
महिलाओं की प्रतिक्रियाएँ
प्रशिक्षण में शामिल मीरा पटेल ने कहा – “हमें पहली बार ऐसा अवसर मिला है कि हम गोबर-गोमूत्र से उपयोगी चीजें बनाकर घर की आय बढ़ा सकते हैं। यह हमारे लिए आत्मसम्मान की बात है।”
वहीं गीता लोधी ने बताया – “अब हम सिर्फ पशुपालन तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि गौशाला से निकलने वाले उत्पादों को बेचकर रोजगार भी अर्जित करेंगे।”
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा सहारा
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में भी कारगर साबित होगी। गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ महिलाओं के हाथों में आर्थिक शक्ति आएगी और स्थानीय स्तर पर जैविक व प्राकृतिक उत्पादों की उपलब्धता भी बढ़ेगी।