सागर, 06 सितम्बर 2025।
आसमान आज एक अद्भुत और दुर्लभ खगोलीय घटना का गवाह बनेगा। रविवार 7 सितम्बर की रात साल का आख़िरी चंद्रग्रहण दिखाई देगा। यह वही खगोलीय क्षण होगा जब चांद तामिया लाल रंग में नज़र आएगा और “ब्लड मून” के नाम से पुकारा जाएगा। विज्ञान के क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त विज्ञान प्रसारक सारिका घारू ने इस ग्रहण से जुड़ी विस्तृत जानकारी साझा करते हुए बताया कि यह घटना न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के बड़े हिस्से – ऑस्ट्रेलिया, एशिया, अफ्रीका और यूरोप – में दिखाई देगी। लगभग 85 प्रतिशत आबादी इस “ब्लड मून” की गवाह बनेगी।

ग्रहण का खगोलीय विज्ञान
सारिका घारू ने समझाया कि चंद्रग्रहण तब होता है जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच सीध में आ जाती है। ऐसे में सूर्य की सीधी रोशनी चंद्रमा तक नहीं पहुंच पाती और पृथ्वी की वायुमंडलीय परतों से गुजरती लाल तरंगें चांद तक पहुंचती हैं। यही कारण है कि पूर्ण ग्रहण की अवस्था में चांद रक्तिम लाल दिखाई देता है। इस लालिमा को वैज्ञानिक भाषा में “रेली स्कैटरिंग” का परिणाम बताया जाता है। इसी वजह से इसे लोकप्रिय रूप से ब्लड मून कहा जाता है।
पितृपक्ष और ग्रहण का संयोग
दिलचस्प बात यह है कि यह ग्रहण पितृपक्ष के आरंभ के साथ जुड़ा हुआ है। सारिका घारू के अनुसार, “इस बार पितृपक्ष की शुरुआत 7 सितम्बर को चंद्रग्रहण से होगी और समापन 21 सितम्बर को पड़ने वाले सूर्यग्रहण यानी पितृमोक्ष अमावस्या के साथ होगा।” इस धार्मिक संयोग को विद्वानों ने विशेष महत्व का माना है।

समय सारणी
इस खगोलीय घटना की समयावधि काफी लंबी होगी। सारिका ने बताया कि –
- आंशिक ग्रहण का आरंभ – रात 09:57:09 बजे
- पूर्ण ग्रहण का आरंभ – रात 11:00:48 बजे
- अधिकतम ग्रहण का क्षण – रात 11:41:47 बजे
- पूर्ण ग्रहण की समाप्ति – रात 12:22:51 बजे
- आंशिक ग्रहण की समाप्ति – रात 01:26:31 बजे
कुल मिलाकर, पूर्ण चंद्रग्रहण की अवधि लगभग 1 घंटा 22 मिनट रहेगी। यह 2022 के बाद का सबसे लंबा पूर्णग्रहण है। 2022 में हुए ग्रहण की अवधि 1 घंटा 25 मिनट रही थी, जो इस बार के ग्रहण से केवल तीन मिनट ज्यादा थी।
ब्लड मून: एक अद्भुत नज़ारा
खगोल विज्ञान प्रेमियों और आम जनता के लिए यह ग्रहण खास है क्योंकि इसे देखने के लिए किसी विशेष उपकरण की आवश्यकता नहीं है। सारिका घारू ने स्पष्ट किया –
“इस पूर्ण चंद्रग्रहण का नज़ारा लोग अपनी खुली आंखों से देख सकते हैं। इसके लिए टेलिस्कोप या विशेष ‘इकलिप्स व्यूअर’ की कोई जरूरत नहीं होगी।”
यह अवसर खगोल प्रेमियों और बच्चों के लिए एक जीवंत अनुभव साबित होगा। नीला आसमान और बीच में लालिमा लिए चमकता चांद, प्रकृति का दुर्लभ दृश्य पेश करेगा।

वैश्विक महत्व
भारत के अलावा यह ग्रहण यूरोप, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में भी साफ तौर पर दिखाई देगा। पश्चिमी देशों में इसे लेकर बड़ी संख्या में लोग खगोलीय कैम्प और अवलोकन कार्यक्रम आयोजित करते हैं। कई विश्वविद्यालय और विज्ञान संस्थान “ब्लड मून” पर विशेष व्याख्यान और सेमिनार आयोजित कर रहे हैं।
धार्मिक और सांस्कृतिक पहलू
भारतीय संस्कृति में ग्रहणों का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व भी माना जाता है। परंपरानुसार, ग्रहणकाल में पूजा-पाठ और भोजन पर रोक होती है। वहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने का अवसर है। सारिका घारू जैसे विज्ञान प्रसारक लगातार प्रयास करते हैं कि लोग ग्रहणों को अंधविश्वास से नहीं बल्कि खगोलीय घटना के रूप में समझें।
शिक्षा और विज्ञान के लिए अवसर
स्कूलों और कॉलेजों के लिए यह चंद्रग्रहण विज्ञान शिक्षण का बेहतरीन अवसर है। शिक्षक छात्रों को न केवल खगोलीय घटना का प्रत्यक्ष अवलोकन करा सकते हैं, बल्कि भौतिकी, खगोलशास्त्र और वायुमंडलीय विज्ञान के सिद्धांतों को भी सरल तरीके से समझा सकते हैं।
सारिका घारू की अपील
सारिका ने नागरिकों से अपील की कि वे इस अवसर को मिस न करें। उन्होंने कहा,
“यह एक ऐसा दृश्य है जो आपको ब्रह्मांड की विशालता और पृथ्वी की स्थिति का एहसास कराएगा। यह हमें सिखाता है कि हम प्रकृति का हिस्सा हैं और उसका सम्मान करना चाहिए।”
निष्कर्ष
7 सितम्बर 2025 की रात का यह चंद्रग्रहण एक ओर जहां वैज्ञानिक और खगोलीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर यह सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से भी चर्चा का विषय है। “ब्लड मून” का यह दृश्य अगली कई पीढ़ियों तक याद किया जाएगा।
आज की रात आसमान की ओर निहारें और इस खगोलीय चमत्कार का प्रत्यक्ष अनुभव करें।