जबलपुर हाईकोर्ट में ‘प्रमोशन में आरक्षण’ पर आज अहम सुनवाई

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अंतरिम राहत पर टिकी निगाहें, चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच करेगी सुनवाई

जबलपुर।
मध्यप्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण (Reservation in Promotion) का मुद्दा एक बार फिर हाईकोर्ट की चौखट पर है। मंगलवार को चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और उनकी डिवीजन बेंच इस प्रकरण पर सुनवाई करेगी। सुनवाई का मुख्य फोकस राज्य सरकार की ओर से मांगी गई अंतरिम राहत और याचिकाकर्ताओं के तर्कों पर होगा।

सरकार का जवाब अधूरा बताया

पिछली सुनवाई में राज्य सरकार ने कोर्ट के समक्ष अपना जवाब पेश किया था, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने इसे अधूरा करार दिया। उनका कहना है कि सरकार ने क्रीमी लेयर, क्वांटिफायबल डेटा और बैकलॉग वैकेंसी जैसे अहम मुद्दों पर कोई ठोस जवाब नहीं दिया है। यही कारण है कि अदालत ने मामले की विस्तृत सुनवाई के लिए आज की तारीख तय की।

सरकार की दलील

राज्य सरकार ने नई प्रमोशन पॉलिसी लागू करने के लिए कोर्ट से अनुमति (अंतरिम राहत) मांगी है। सरकार का दावा है कि नई नीति कर्मचारियों के हित में है और इससे सभी वर्गों को समान अवसर मिल सकेगा। साथ ही यह भी कहा गया है कि इसमें पुराने नियमों की तुलना में सुधार किया गया है।

याचिकाकर्ताओं का विरोध

भोपाल निवासी डॉ. स्वाति तिवारी सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि 2002 की प्रमोशन नीति को हाईकोर्ट पहले ही रद्द कर चुका है। इसके बावजूद राज्य सरकार ने उसी नीति को कुछ संशोधनों के साथ फिर से लागू करने की कोशिश की है। उनका कहना है कि मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, ऐसे में नई पॉलिसी लाना असंवैधानिक है।

अंडरटेकिंग और यथास्थिति

हाईकोर्ट ने पहले ही सरकार से एक अंडरटेकिंग ली थी कि जब तक कोर्ट अंतिम आदेश नहीं देता, नई प्रमोशन पॉलिसी लागू नहीं की जाएगी। यानी फिलहाल यथास्थिति (status quo) बनी हुई है। बावजूद इसके, सरकार अंतरिम राहत मांग रही है ताकि वह नई नीति को अमल में ला सके।

पिछली सुनवाई में क्या हुआ था

14 अगस्त को हुई सुनवाई में राज्य सरकार ने समय मांगा था, यह कहते हुए कि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को हाईकोर्ट में बहस के लिए नियुक्त किया गया है। पिछली बार वैद्यनाथन ने कोर्ट से कहा था कि सरकार की ओर से दी गई ओरल अंडरटेकिंग की वजह से प्रमोशन अटक गए हैं, इसलिए सुनवाई को आगे बढ़ाया जाए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से उठाए गए सवाल

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अमोल श्रीवास्तव ने कोर्ट को बताया कि—

  • सरकार का जवाब अधूरा है।
  • क्रीमी लेयर का प्रावधान लागू करने पर कोई स्पष्ट स्थिति नहीं है।
  • बैकलॉग वैकेंसी भरने की समयसीमा तय कर देना कर्मचारियों के साथ अन्याय है।
  • पहले के आरबी राय केस में कई पदोन्नतियों को असंवैधानिक ठहराया गया था। उस मामले पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आना बाकी है। ऐसे में सरकार नई पॉलिसी कैसे लागू कर सकती है?

क्यों अहम है यह मामला

प्रमोशन में आरक्षण का मुद्दा मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में चर्चा का विषय रहा है। यह सीधे-सीधे लाखों सरकारी कर्मचारियों के करियर, पदोन्नति और भविष्य से जुड़ा है। कोर्ट का फैसला आने वाले दिनों में न केवल कर्मचारियों पर असर डालेगा, बल्कि राज्य सरकार की नीतिगत दिशा भी तय करेगा।

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