MP बना गिद्धों का सबसे बड़ा सुरक्षित ठिकाना: 14 हजार के पार पहुंच सकती है संख्या, 16 टाइगर रिजर्व में हुई गणना !

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मध्य प्रदेश एक बार फिर वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में नई उपलब्धि की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। चीता, टाइगर और तेंदुओं के लिए पहचान बना चुका प्रदेश अब गिद्ध संरक्षण में भी देशभर में मिसाल बनता जा रहा है। प्रदेश में 22 से 24 मई के बीच आयोजित राज्यव्यापी गिद्ध गणना अभियान के बाद अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार गिद्धों की संख्या 14 हजार के आंकड़े को पार कर सकती है। यदि ऐसा होता है तो यह पिछले एक दशक में गिद्ध संरक्षण की सबसे बड़ी सफलता मानी जाएगी।

वन विभाग द्वारा प्रदेश के 16 वन वृत्त, 9 टाइगर रिजर्व, वन विकास निगम क्षेत्रों और अन्य संरक्षित जंगलों में एक साथ गिद्धों की गणना कराई गई। खास बात यह रही कि पहली बार आधुनिक ऑनलाइन एप के जरिए डेटा एकत्र किया गया, जिससे गणना अधिक सटीक और पारदर्शी बन सकी। शुरुआती रिपोर्ट्स में कई इलाकों में गिद्धों की मौजूदगी पहले से अधिक दर्ज की गई है।

कभी विलुप्ति की कगार पर थे गिद्ध

एक समय ऐसा था जब देशभर में गिद्धों की संख्या तेजी से घट रही थी। वर्ष 1990 के आसपास भारत में लगभग 4 करोड़ गिद्ध बताए जाते थे, लेकिन कुछ ही वर्षों में इनकी आबादी लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गई। इसका सबसे बड़ा कारण पशुओं को दी जाने वाली डायक्लोफेनाक दवा थी।

जब यह दवा खाने वाले पशु मर जाते थे और उनके शव गिद्ध खाते थे, तो दवा का विषैला असर गिद्धों की किडनी पर पड़ता था, जिससे उनकी मौत हो जाती थी। लगातार घटती संख्या को देखते हुए सरकार ने इस दवा पर प्रतिबंध लगाया और संरक्षण अभियान शुरू किए। अब उसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं।

10 साल में दोगुनी हुई संख्या

मध्य प्रदेश में वर्ष 2016 में पहली बार गिद्धों की गणना की गई थी। उस समय प्रदेश में कुल 7028 गिद्ध दर्ज किए गए थे। इसके बाद लगातार संरक्षण प्रयासों और सुरक्षित आवासों के कारण इनकी संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई।

वर्ष 2019 में संख्या बढ़कर 8397 पहुंची।
2021 में यह आंकड़ा 9446 हुआ।
2024 में 10,845 गिद्ध दर्ज किए गए।
वहीं 2025 की गणना में 12,981 गिद्ध मिले थे।

अब 2026 की गणना में यह संख्या 14 हजार के पार जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। वन अधिकारियों के मुताबिक यह प्रदेश के लिए बड़ी उपलब्धि है और इससे साबित होता है कि संरक्षण प्रयास सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

7 प्रजातियों की मौजूदगी बनी खास

प्रदेश में गिद्धों की कुल सात प्रजातियां पाई गई हैं। इनमें चार स्थानीय और तीन प्रवासी प्रजातियां शामिल हैं। इस बार की गणना में भारतीय गिद्ध, सिनेरियस गिद्ध, मिस्र गिद्ध, हिमालयन ग्रिफॉन और सफेद पीठ वाले गिद्ध प्रमुख रूप से देखे गए।

पन्ना टाइगर रिजर्व में लाल सिर वाले दुर्लभ गिद्ध दिखाई दिए, जबकि वन विहार नेशनल पार्क में सफेद पीठ वाले गिद्धों की मौजूदगी दर्ज की गई। वन विभाग के अनुसार यह संकेत है कि प्रदेश का प्राकृतिक वातावरण इन पक्षियों के लिए अनुकूल बनता जा रहा है।

ऐसे होती है गिद्धों की गणना

गिद्धों की गणना बेहद सावधानी और वैज्ञानिक तरीके से की जाती है। गणनाकर्मी और स्वयंसेवक सूर्योदय होते ही उन स्थानों पर पहुंच जाते हैं जहां गिद्धों के घोंसले या विश्राम स्थल मौजूद होते हैं।

इसके बाद घोंसलों के आसपास बैठे गिद्धों और उनके बच्चों की गिनती की जाती है। उड़ते हुए गिद्धों को गणना में शामिल नहीं किया जाता ताकि एक ही पक्षी की दोबारा गिनती न हो। इस बार ऑनलाइन एप के माध्यम से सभी आंकड़े तुरंत रिकॉर्ड किए गए, जिससे रिपोर्ट तैयार करना आसान हुआ।

वन विभाग का कहना है कि शीत ऋतु का अंतिम समय गिद्ध गणना के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इस दौरान स्थानीय और प्रवासी दोनों प्रजातियां एक साथ दिखाई देती हैं।

भोपाल में चल रहा विशेष संरक्षण अभियान

भोपाल के केरवा डैम स्थित गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र में वर्ष 2014 से विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। यहां सफेद पीठ वाले और लंबी चोंच वाले गिद्धों का प्रजनन कराया जा रहा है।

मार्च 2017 में यहां पहली बार सफल प्रजनन के रूप में गिद्ध का चूजा पैदा हुआ था। इसके बाद लगातार प्रजनन कार्यक्रम चल रहे हैं। करीब तीन साल पहले हरियाणा से 20 सफेद पीठ वाले गिद्ध भोपाल लाए गए थे, जिन्हें विशेष एवरी में रखा गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार गिद्ध साल में केवल एक बार अंडा देते हैं और उनके बच्चों के जीवित रहने की दर करीब 50 प्रतिशत होती है। यही वजह है कि इनकी संख्या बढ़ने में लंबा समय लगता है।

“धरती के सफाई दूत” क्यों हैं जरूरी

गिद्धों को प्रकृति का सफाईकर्मी कहा जाता है। ये मृत पशुओं के शवों को खाकर पर्यावरण को साफ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि गिद्ध न हों तो सड़ते शवों से संक्रमण और बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि गिद्धों की बढ़ती संख्या पर्यावरण संतुलन के लिए बेहद सकारात्मक संकेत है। यही कारण है कि अब प्रदेश में इनके संरक्षण को लेकर लगातार विशेष योजनाएं चलाई जा रही हैं।

टाइगर स्टेट के बाद अब “वल्चर स्टेट” बनने की ओर MP

मध्य प्रदेश पहले से ही “टाइगर स्टेट”, “लेपर्ड स्टेट” और चीता संरक्षण के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। अब गिद्धों की लगातार बढ़ती संख्या ने प्रदेश को “वल्चर स्टेट” की दिशा में भी मजबूत पहचान दिलानी शुरू कर दी है।

वन विभाग का मानना है कि यदि संरक्षण की यही रफ्तार जारी रही तो आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश देश में गिद्ध संरक्षण का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है।

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