“कलियुग में श्रीराम और श्रीकृष्ण के आदर्श ही मानवता का मार्गदर्शन करेंगे” — अविराज सिंह !

Spread the love

सागर। युवा नेता अविराज सिंह ने कहा कि वर्तमान कलियुग में जब समाज स्वार्थ, अराजकता और छल-कपट की ओर बढ़ रहा है, ऐसे समय में भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के आदर्श ही मानव जीवन को सही दिशा प्रदान कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण केवल अर्जुन के सारथी नहीं थे, बल्कि संपूर्ण मानवता के मार्गदर्शक हैं। जीवन को एक युद्धभूमि बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अर्जुन के समान है, जिसे अपने भीतर के कृष्ण की वाणी सुनकर धर्म और सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।

वे सरस्वती शिशु मंदिर, लवकुश भवन, पटकुई में आयोजित सप्त दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा में सहभागिता के दौरान संबोधित कर रहे थे। कथा का वाचन आचार्य पंडित ऋषि महाराज द्वारा किया जा रहा है।

अविराज सिंह ने भगवान श्रीकृष्ण के बहुआयामी व्यक्तित्व का उल्लेख करते हुए कहा कि वे केवल धर्मरक्षक ही नहीं, बल्कि अद्वितीय आर्किटेक्ट, महान संगीतज्ञ, वीर योद्धा और आदर्श मित्र भी थे। उन्होंने कहा कि प्रजा की रक्षा के लिए समुद्र के मध्य द्वारका नगरी का निर्माण कराने वाले श्रीकृष्ण ने यह सिद्ध किया कि नेतृत्व केवल सत्ता नहीं, बल्कि जनकल्याण का माध्यम होता है। बांसुरी की मधुर धुन से संपूर्ण सृष्टि को मंत्रमुग्ध करने वाले श्रीकृष्ण ने धर्म की रक्षा के लिए युद्ध का भी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मित्रता का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने अपने मित्र को सिंहासन पर बैठाया और सदैव जनसामान्य के सुख-दुख में सहभागी बने रहे।

उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता जैसा महान ग्रंथ मानवता को प्रदान करने वाले भगवान श्रीकृष्ण से बड़ा गुरु कोई नहीं हो सकता। आज के समय में जब कथनी और करनी के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है, तब गीता के उपदेश मानव जीवन को स्थिरता और सत्य का मार्ग दिखाते हैं।

कलियुग की परिस्थितियों का वर्णन करते हुए अविराज सिंह ने कहा कि आने वाले समय में जल के अथाह सागर होंगे, लेकिन प्यास नहीं बुझेगी। अन्न के विशाल भंडार होंगे, लेकिन भूख समाप्त नहीं होगी। समाज आदर्शों से अधिक धन को महत्व देगा और परमार्थ की भावना धीरे-धीरे समाप्त होती जाएगी। ऐसे दौर में केवल प्रभु नाम का जाप ही मनुष्य को आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करेगा।

उन्होंने श्रीमद्भागवत पुराण का उल्लेख करते हुए कहा —

“कलेर दोषनिधे राजन् अस्ति ह्येको महान् गुणः।
कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंगः परं व्रजेत्॥”

अर्थात कलियुग दोषों का भंडार होते हुए भी एक महान गुण से युक्त है कि केवल भगवान श्रीकृष्ण के नाम का कीर्तन करने मात्र से मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

अविराज सिंह ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व अधर्म के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए अवतार लिया था। उन्होंने मानव जाति को यह संदेश दिया कि जीवन में कर्तव्यों का पालन करते हुए आदर्श मार्ग पर कैसे चला जाता है। उन्होंने कहा कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होना ही सच्चा धर्म है और जब धर्म संकट में हो, तब मौन रहना भी अधर्म के समान माना जाता है।

भगवान श्रीराम के आदर्शों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि महल मनुष्य को विलासी बनाता है, जबकि वनवास उसे तपस्वी और विश्वविजेता बनाता है। भगवान श्रीराम का वास्तविक साम्राज्य दंडकारण्य में स्थापित हुआ। उन्होंने कहा कि रावण अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा था, जबकि भगवान श्रीराम कर्तव्यों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे और इतिहास सदैव कर्तव्य की विजय को ही याद रखता है।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने व्यक्तिगत सुख से ऊपर उठकर समाज और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को प्राथमिकता दी। उन्होंने माता शबरी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रेम और समर्पण ही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है। श्रीराम ने माता शबरी द्वारा प्रेमपूर्वक दिए गए बेरों को सबसे श्रेष्ठ भोजन बताया था, जो सेवा और भक्ति की महानता को दर्शाता है।

युवाओं को संबोधित करते हुए अविराज सिंह ने कहा कि भगवान श्रीराम ने कभी भी अपनी परिस्थितियों के लिए भाग्य को दोष नहीं दिया। चाहे गुरुकुल की शिक्षा हो, राक्षसों का संहार हो या वनवास का कठिन समय, उन्होंने हर परिस्थिति के लिए स्वयं को तैयार किया। उन्होंने कहा कि आज के युवाओं को ज्ञान, कौशल, अनुशासन और उत्तम व्यवहार को अपने जीवन का आधार बनाना चाहिए। ज्ञान, बल, यश, सौंदर्य और त्याग जैसे षड्गुणों को विकसित करके ही व्यक्ति समाज में उच्च स्थान प्राप्त कर सकता है।

उन्होंने भगवान शिव की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि गंगाजी सभी नदियों में श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार पार्थिव शिवलिंग सभी लिंगों में सर्वोत्तम माना गया है। मंत्रों में ओंकार, पुरियों में काशी और व्रतों में शिवरात्रि का सर्वोच्च महत्व है। उन्होंने कहा कि शिव ही सत्य, अनंत, अनादि और ब्रह्म स्वरूप हैं। शिव भक्ति और शक्ति दोनों के प्रतीक हैं।

अंत में उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का मूल उद्देश्य मानव जीवन को धर्म, सेवा, संस्कार और भक्ति से जोड़ना है। पंचतत्वों में समस्त देवशक्तियों का वास माना गया है और यही सनातन संस्कृति मानवता को संतुलन, शांति और आध्यात्मिक चेतना का संदेश देती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *