पन्ना/खजुराहो।
खजुराहो-पन्ना रेल लाइन परियोजना में रेलवे अधिकारियों की बड़ी लापरवाही सामने आई है। जिस रेल रूट को वर्ष 2021 में अंतिम रूप देकर उस पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए, अब उसी रूट को रेलवे ने असुरक्षित बताते हुए बदल दिया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पुराने रूट पर रेल लाइन बिछाने की तैयारी में 24.78 करोड़ रुपए खर्च कर 54,578 पेड़ कटवा दिए गए थे। अब नए डिजाइन के लिए फिर से जंगल की जमीन अधिग्रहित की जा रही है और अनुमान लगाया जा रहा है कि करीब 50 हजार और पेड़ काटे जाएंगे। इस पूरे मामले ने रेलवे की योजना निर्माण प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह परियोजना ललितपुर-सिंगरौली रेल परियोजना का हिस्सा है, जिसके तहत खजुराहो को पन्ना से रेल मार्ग द्वारा जोड़ना प्रस्तावित है। यह रेल लाइन पहाड़ी और वन क्षेत्र से होकर गुजर रही है, जिसमें अजयगढ़ घाटी का संवेदनशील इलाका भी शामिल है। रेलवे ने वर्ष 2021 में परियोजना का डिजाइन और रूट फाइनल कर लिया था। इसके बाद लगभग 315 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहित की गई और वर्ष 2022-23 के दौरान जंगल में लगे 54,578 पेड़ काट दिए गए।

लेकिन अब रेलवे ने स्वीकार किया है कि पुराने डिजाइन में गंभीर तकनीकी खामियां थीं। रेलवे अधिकारियों के अनुसार पुराने रूट में छह बड़े मोड़ थे, जिनके कारण ट्रेन संचालन सुरक्षित नहीं माना जा रहा था। रेलवे का कहना है कि ऐसे घुमावदार हिस्सों में तेज गति से ट्रेन चलाना जोखिमभरा हो सकता था। इसी कारण अब पूरा रूट डिजाइन बदल दिया गया है।
रेलवे के डिप्टी चीफ इंजीनियर शशांक साहू के अनुसार नए डिजाइन में मोड़ों का घुमाव कम किया गया है ताकि ट्रेनों का संचालन अधिक सुरक्षित हो सके। पहले परियोजना में 8 सुरंगें प्रस्तावित थीं, लेकिन अब नए डिजाइन में 7 सुरंगें और 10 बड़े पुल बनाए जाएंगे। हालांकि इस बदलाव ने परियोजना की लागत और समयसीमा दोनों को प्रभावित किया है।
नए रूट के लिए अब 258 हेक्टेयर जंगल क्षेत्र का दोबारा अधिग्रहण किया जा रहा है। वन विभाग ने नए इलाके में पेड़ों की गिनती शुरू कर दी है और प्रारंभिक अनुमान के अनुसार करीब 50 हजार अतिरिक्त पेड़ काटने पड़ सकते हैं। इससे पर्यावरण प्रेमियों और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों में चिंता बढ़ गई है।
परियोजना का नया रूट पन्ना टाइगर रिजर्व क्षेत्र के नजदीक से गुजर रहा है। रेलवे द्वारा पहाड़ काटकर सुरंग और पुल निर्माण किया जाएगा, जिससे भारी मात्रा में मलबा निकलेगा। रेलवे इस मलबे को जंगल क्षेत्र में ही डंप करना चाहता है, लेकिन पन्ना टाइगर रिजर्व प्रशासन ने इसका विरोध किया है।
पन्ना टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर वीके पटेल ने रेलवे को पत्र लिखकर स्पष्ट कहा है कि निर्माण कार्य का मलबा जंगल क्षेत्र के बाहर डंप किया जाए। उनका कहना है कि जंगल में मलबा डालने से वन्यजीवों और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। टाइगर रिजर्व प्रशासन का मानना है कि इस तरह की गतिविधियां प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करेंगी।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब वर्ष 2021 में रेलवे ने रूट डिजाइन को अंतिम मंजूरी दी थी, तब इन तकनीकी खामियों को क्यों नहीं पहचाना गया। यदि पुराना रूट वास्तव में इतना जोखिमभरा था, तो हजारों पेड़ कटवाने और करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद उसे बदलने की नौबत क्यों आई।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी बड़ी परियोजना में तकनीकी सर्वे, सुरक्षा मूल्यांकन और पर्यावरणीय अध्ययन सबसे महत्वपूर्ण चरण होते हैं। इसके बावजूद यदि बाद में डिजाइन बदलना पड़ रहा है, तो यह योजना निर्माण प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।
इस फैसले से न केवल सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है, बल्कि पर्यावरण को भी भारी नुकसान हुआ है। पहले ही हजारों पेड़ काटे जा चुके हैं और अब नए रूट के लिए फिर से बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र प्रभावित होगा। पर्यावरणविदों का कहना है कि वर्षों पुराने पेड़ों की भरपाई आसानी से नहीं की जा सकती।
परियोजना अब लगभग तीन वर्ष पीछे चली गई है। नए सर्वे, नई स्वीकृतियों और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के कारण लागत लगातार बढ़ रही है। बताया जा रहा है कि रेलवे ने नए रूट के लिए निजी एजेंसियों से दोबारा सर्वे भी कराया है, जिससे अतिरिक्त खर्च बढ़ा है।
सबसे गंभीर सवाल जवाबदेही को लेकर उठ रहा है। अब तक इस मामले में किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं की गई है। करोड़ों रुपए खर्च होने और बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय नुकसान के बावजूद रेलवे प्रशासन की ओर से किसी प्रकार की कार्रवाई सामने नहीं आई है।
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और यह पता लगाया जाए कि आखिर इतनी बड़ी तकनीकी गलती कैसे हुई। उनका कहना है कि यदि समय रहते सही सर्वे और परीक्षण किए जाते, तो हजारों पेड़ों की कटाई और सरकारी धन की बर्बादी रोकी जा सकती थी।
खजुराहो-पन्ना रेल परियोजना अब केवल एक विकास परियोजना नहीं रह गई है, बल्कि यह सरकारी योजनाओं में तकनीकी लापरवाही, पर्यावरणीय क्षति और जवाबदेही के सवालों का बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है।