मध्यप्रदेश के राज्यपाल श्री मंगूभाई पटेल ने रविवार को दमोह जिले के जबेरा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत चौरई में निर्मित जनजातीय समाज के आराध्य बड़ादेव पेनठाना स्थल का लोकार्पण किया। लगभग 1 करोड़ 16 लाख रुपए की लागत से निर्मित इस भव्य आराधना स्थल के लोकार्पण समारोह में भारी जनसमुदाय उपस्थित रहा।

राज्यपाल श्री पटेल ने बड़ादेव की पूजा-अर्चना करते हुए कहा कि जनजातीय गौरव, इतिहास और संस्कृति के पुनर्जीवन के लिए राज्य सरकार निरंतर प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की मान्यताओं और परंपराओं का संरक्षण केवल मंदिर या स्मारक से नहीं बल्कि उनके जीवन, शिक्षा और आजीविका के उत्थान से ही संभव है।

राज्यपाल ने इस अवसर पर कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनजातीय समाज के कल्याण के लिए संवेदनशील हैं। उनके नेतृत्व में जनमन योजना, धरती आबा योजना, उज्ज्वला योजना और आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं समाज के अंतिम छोर तक लाभ पहुंचा रही हैं। उन्होंने बताया कि जनमन योजना के अंतर्गत बैगा, भारिया और सहरिया जैसे अति-पिछड़े जनजातीय समाज को सीधा लाभ दिया जा रहा है।

राज्यपाल ने वीरांगना रानी दुर्गावती के बलिदान का स्मरण करते हुए कहा कि उनका जीवन संघर्ष और साहस हम सभी के लिए प्रेरणादायी है।
समारोह को संबोधित करते हुए केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने कहा कि आदिवासी समाज का इतिहास गौरवशाली है। उन्होंने ऋग्वेद से लेकर पौराणिक प्रसंगों में जनजातीय योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि गोंड राजाओं ने मध्यभारत में लगभग 1400 वर्षों तक शासन किया।

मध्यप्रदेश के संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री धर्मेन्द्र सिंह लोधी ने घोषणा की कि चौरई में बने इस पेनठाना को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। वहीं पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने कहा कि जनमन योजना और धरती आबा योजना से आदिवासी समाज का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित होगा।
इस अवसर पर क्षेत्रीय सांसद राहुल सिंह ने नागरिकों से स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का आह्वान किया। समारोह में पूर्व सांसद डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया, विधायक उमादेवी खटीक, जिला पंचायत अध्यक्ष रंजीता गौरव पटेल, भाजपा जिलाध्यक्ष श्याम शिवहरे सहित बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।

राज्यपाल ने इस अवसर पर दमोह जिले के जनजातीय जीवन पर आधारित पुस्तिका का विमोचन किया और परिसर में ‘मां के नाम पेड़’ अभियान के तहत पौधारोपण भी किया।
इस लोकार्पण समारोह ने न केवल जनजातीय समाज की आस्था को नया आयाम दिया बल्कि जनजातीय गौरव, संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित एवं संवर्धित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।