जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने मंडला जिला अस्पताल की खराब स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर दायर जनहित याचिका पर गंभीर रुख अपनाया है। अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार, स्वास्थ्य विभाग और मंडला के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई जून में निर्धारित की गई है।
मंगलवार को हुई सुनवाई में चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने जिला अस्पताल की स्थिति को लेकर प्रस्तुत तथ्यों को गंभीरता से लिया। याचिका में आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, डॉक्टरों की कमी और प्रसूति वार्ड की अव्यवस्थाओं को प्रमुख मुद्दा बनाया गया है।
“10 लाख आबादी एक अस्पताल पर निर्भर”
जनहित याचिका पंकज कुमार सोनी की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि मंडला जिले की आबादी लगभग 10 लाख है, जिसमें करीब 70 प्रतिशत लोग आदिवासी समुदाय से आते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण अधिकांश लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर हैं, लेकिन जिला अस्पताल में मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव बना हुआ है।

याचिका में कहा गया कि अस्पताल में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन संसाधन और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण लोगों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा।
42 पद स्वीकृत, सिर्फ 17 डॉक्टर कार्यरत
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता धनंजय असाटी ने कोर्ट को बताया कि जिला अस्पताल में डॉक्टरों के 42 पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 17 डॉक्टर ही पदस्थ हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी के चलते मरीजों को गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
उन्होंने बताया कि अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट, न्यूरोलॉजिस्ट, गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, यूरोलॉजिस्ट और रेडियोलॉजिस्ट जैसे विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। हालत यह है कि किसी मरीज को गंभीर बीमारी होने पर उसे नागपुर या जबलपुर रेफर करना पड़ता है।
रेडियोलॉजिस्ट नहीं, बंद पड़ी सोनोग्राफी मशीनें
याचिका में यह भी बताया गया कि रेडियोलॉजिस्ट नहीं होने के कारण अस्पताल में लगी सोनोग्राफी मशीनें उपयोग में नहीं आ पा रही हैं। इसके कारण मरीजों को निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों में महंगे टेस्ट कराने पड़ रहे हैं।
गरीब और आदिवासी मरीजों के लिए यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन गया है। कई मरीज इलाज में देरी के कारण गंभीर स्थिति में पहुंच जाते हैं।
प्रसूति वार्ड की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक
याचिका में जिला अस्पताल के प्रसूति वार्ड की हालत को बेहद दयनीय बताया गया है। आरोप है कि बिस्तरों की भारी कमी के चलते गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को फर्श पर लेटना पड़ रहा है।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि अस्पताल में पर्याप्त बेड उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीजों को जमीन पर इलाज कराना पड़ता है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। यह स्थिति महिलाओं और नवजातों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है।
याचिका में कहा गया कि यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।
प्रशासनिक चुप्पी पर उठे सवाल
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार की मांग को लेकर कई बार प्रशासन को ज्ञापन दिए गए। शांतिपूर्ण प्रदर्शन और कानूनी नोटिस भी भेजे गए, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
याचिका में राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि लंबे समय से समस्याएं बनी हुई हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी उदासीन बने हुए हैं।
संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 47 का हवाला
जनहित याचिका संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 47 के उल्लंघन को आधार बनाकर दायर की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता धनंजय असाटी और रामकिशोर शिवहरे पैरवी कर रहे हैं।
याचिका में अदालत से मांग की गई है कि जिला अस्पताल में तत्काल अतिरिक्त बिस्तरों की व्यवस्था कराई जाए, विशेषज्ञ डॉक्टरों के रिक्त पद समयबद्ध तरीके से भरे जाएं और स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
हाईकोर्ट के नोटिस से बढ़ी प्रशासन की चिंता
हाईकोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की चिंता बढ़ गई है। अब राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करना होगा।
माना जा रहा है कि यदि अस्पताल की व्यवस्थाओं में जल्द सुधार नहीं हुआ तो कोर्ट इस मामले में और सख्त रुख अपना सकता है।