सागर। पर्यावरण प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और भूजल स्तर में लगातार गिरावट आज देश के सामने गंभीर चुनौती बनकर उभर रही है। विशेष रूप से मध्यप्रदेश और बुंदेलखंड क्षेत्र में पथरीली एवं बंजर पहाड़ियों का विस्तार, भूमि कटाव और जल संरक्षण की कमी इन समस्याओं को और अधिक बढ़ा रही है। ऐसे समय में वैज्ञानिकों द्वारा सुझाया गया जल संरक्षण एवं पौधारोपण आधारित मॉडल न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है, बल्कि आने वाले वर्षों में बंजर पहाड़ियों को पुनः हरा-भरा बनाने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान केंद्र सागर के प्रमुख वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. के.एस. यादव के अनुसार वृक्षों की अंधाधुंध कटाई और प्राकृतिक वन क्षेत्रों में कमी के कारण वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है तथा ऑक्सीजन की उपलब्धता कम होती जा रही है। इसका सीधा असर जलवायु पर पड़ रहा है, जिससे तापमान में वृद्धि, सूखा, बाढ़ और वर्षा के असंतुलित वितरण जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार एक विकसित वृक्ष प्रतिवर्ष लगभग 100 से 120 किलोग्राम ऑक्सीजन वातावरण में छोड़ता है तथा बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण करता है। यही कारण है कि वृक्षारोपण को जलवायु परिवर्तन से निपटने का सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है।

बुंदेलखंड क्षेत्र में बड़ी संख्या में ऐसी पहाड़ियां और पथरीली भूमि मौजूद हैं जहां वर्षा का अधिकांश पानी बहकर नदियों और नालों के माध्यम से बाहर निकल जाता है। इसके साथ ही उपजाऊ मिट्टी का कटाव भी होता है, जिससे भूमि की उत्पादकता लगातार घटती जाती है। यदि इन क्षेत्रों में जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण कर उपयुक्त वृक्ष एवं झाड़ियों का रोपण किया जाए तो न केवल भूमि संरक्षण संभव होगा, बल्कि भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता संवर्धन और पर्यावरण सुधार में भी उल्लेखनीय सफलता मिल सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे क्षेत्रों के लिए खेजड़ी, करंज, देशी बबूल, कुमठा, कैर, सीताफल और बेर जैसी प्रजातियां अत्यंत उपयुक्त हैं। खेजड़ी को शमी और जांटी के नाम से भी जाना जाता है तथा यह अत्यधिक सूखा सहन करने वाली प्रजाति है। इसकी सांगरी फलियां आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। करंज मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायक है, जबकि कुमठा से उच्च गुणवत्ता का गोंद प्राप्त होता है। कैर, सीताफल और बेर जैसी प्रजातियां कम पानी और पथरीली भूमि में भी आसानी से विकसित हो जाती हैं।

इसके अलावा अगावे, नागफनी और थोर जैसी प्रजातियां ढालों और कटावग्रस्त क्षेत्रों में विशेष रूप से उपयोगी मानी जाती हैं। ये पौधे मिट्टी के कटाव को रोकने, जीवित बाड़ तैयार करने और अत्यंत कम पानी में भी जीवित रहने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि इन्हें पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर लगाने की सलाह दी जाती है।
डॉ. यादव के अनुसार पहाड़ी क्षेत्रों में जल संरक्षण के लिए कंटूर आधारित अर्धचंद्राकार संरचनाएं अत्यंत प्रभावी सिद्ध होती हैं। इन संरचनाओं को ढाल की समान ऊंचाई पर बनाया जाता है, जिससे वर्षा का पानी उसमें एकत्र होकर धीरे-धीरे भूमि में समा जाता है। इससे पौधों को नमी मिलती है और भूजल स्तर में भी सुधार होता है। अधिक ढाल वाले क्षेत्रों में कंटूर ट्रेंच बनाकर भी जल संरक्षण किया जा सकता है।
पौधारोपण के लिए जून से अगस्त का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। पहली अच्छी वर्षा के बाद 45×45×45 सेंटीमीटर अथवा पथरीली भूमि में 60×60×60 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे तैयार कर उनमें गोबर खाद मिलाकर पौधारोपण किया जाना चाहिए। जहां पौधे उपलब्ध नहीं हों, वहां सीधे बीजों की बुवाई भी की जा सकती है। वैज्ञानिकों की सलाह है कि प्रत्येक गड्ढे में संबंधित प्रजाति के दो से तीन बीज लगाए जाएं ताकि कम से कम एक पौधा सफलतापूर्वक विकसित हो सके। बाद में अतिरिक्त पौधों को अन्य स्थानों पर प्रतिरोपित किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मिश्रित वृक्षारोपण मॉडल सबसे अधिक सफल रहता है। इसके तहत लगभग 40 प्रतिशत खेजड़ी, 20 प्रतिशत करंज, 15 प्रतिशत बबूल, 10 प्रतिशत कुमठा, 5 प्रतिशत कैर, 5 प्रतिशत सीताफल और 5 प्रतिशत बेर का रोपण किया जा सकता है। वहीं ढालों और कटाव वाले क्षेत्रों में अगावे, नागफनी और थोर का रोपण किया जाना चाहिए।
डॉ. के.एस. यादव का कहना है कि यदि ग्राम पंचायतें, वन समितियां, स्वयंसेवी संस्थाएं, किसान समूह और स्थानीय समुदाय मिलकर इस प्रकार के वृक्षारोपण एवं जल संरक्षण अभियान चलाएं तो आने वाले वर्षों में बंजर पहाड़ियां फिर से हरी-भरी हो सकती हैं। इससे पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, भूमि सुधार, पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता, ग्रामीण रोजगार और जैव विविधता संवर्धन जैसे अनेक लाभ प्राप्त होंगे।
उन्होंने कहा कि बंजर पहाड़ियों को हरित बनाना केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित, स्वस्थ और समृद्ध भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण निवेश भी है। यदि वैज्ञानिक तकनीकों और जनसहभागिता के माध्यम से इस दिशा में गंभीर प्रयास किए जाएं, तो बुंदेलखंड सहित पूरे प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण की नई मिसाल स्थापित की जा सकती है।